लिथियम-आयन बैटरी रीसाइक्लिंग तकनीक के व्यावसायीकरण की दिशा में बड़ा कदम

लिथियम-आयन बैटरी रीसाइक्लिंग तकनीक के व्यावसायीकरण की दिशा में बड़ा कदम

भारत में बैटरी अपशिष्ट प्रबंधन और महत्वपूर्ण खनिजों की पुनर्प्राप्ति को बढ़ावा देने के लिए सीएसआईआर-राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (सीएसआईआर-एनएमएल), जमशेदपुर ने जून 2026 में दो महत्वपूर्ण समझौते किए हैं। 18 जून 2026 को संस्थान ने नई दिल्ली स्थित आर2ई ग्रीनटेक प्राइवेट लिमिटेड के साथ स्वदेशी लिथियम-आयन बैटरी रीसाइक्लिंग तकनीक के व्यावसायीकरण हेतु एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। इससे एक दिन पहले, 17 जून 2026 को बेंगलुरु स्थित सर्कुओर प्राइवेट लिमिटेड के साथ वैज्ञानिक तरीके से अपशिष्ट लिथियम-आयन बैटरियों के पुनर्चक्रण के लिए तकनीक हस्तांतरण समझौता किया गया। यह पहल भारत में बढ़ते बैटरी कचरे के प्रभावी प्रबंधन और मूल्यवान खनिज संसाधनों की पुनर्प्राप्ति की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

लिथियम-आयन बैटरी रीसाइक्लिंग क्या है?

लिथियम-आयन बैटरी रीसाइक्लिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से उपयोग के बाद अनुपयोगी हो चुकी बैटरियों से महत्वपूर्ण धातुओं और अन्य सामग्रियों को पुनः प्राप्त किया जाता है। इन बैटरियों से लिथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज, निकल, तांबा, एल्यूमीनियम और ग्रेफाइट जैसे मूल्यवान पदार्थ निकाले जाते हैं। ये सामग्रियां नई बैटरियों के निर्माण के साथ-साथ विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में भी उपयोग की जाती हैं। रीसाइक्लिंग से प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम होता है और आयातित खनिजों पर निर्भरता घटाने में सहायता मिलती है।

महत्वपूर्ण खनिजों की पुनर्प्राप्ति की तकनीक

सीएसआईआर-एनएमएल द्वारा विकसित तकनीक का उद्देश्य समाप्त हो चुकी बैटरियों से महत्वपूर्ण खनिजों को कुशलतापूर्वक निकालना है। इसके लिए एकीकृत हाइड्रोमेटलर्जिकल सुविधा का उपयोग किया जाता है। हाइड्रोमेटलर्जी धातुओं की पुनर्प्राप्ति की ऐसी तकनीक है जिसमें जलीय रासायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से धातुओं का घुलन, पृथक्करण और शुद्धिकरण किया जाता है। यह विधि बैटरी अपशिष्ट से धातुओं को सुरक्षित और प्रभावी ढंग से निकालने के लिए व्यापक रूप से अपनाई जाती है।

सीएसआईआर-एनएमएल की बैटरी रीसाइक्लिंग सुविधा

सीएसआईआर-एनएमएल ने सितंबर 2023 में जमशेदपुर में अपनी पहली बैटरी रीसाइक्लिंग पायलट सुविधा स्थापित की थी। यह संयंत्र प्रतिदिन लगभग एक टन बैटरियों को विघटित करने और कैथोड सामग्री को अलग करने की क्षमता रखता है। यह सुविधा संस्थान की पेटेंट प्राप्त प्रक्रिया के आधार पर संचालित होती है और प्रयुक्त रिचार्जेबल लिथियम-आयन तथा निकल-आधारित बैटरियों के प्रसंस्करण में सक्षम है। इसके माध्यम से प्रक्रिया सत्यापन और तकनीक हस्तांतरण जैसे कार्य भी किए जाते हैं।

बैटरी अपशिष्ट और सर्कुलर इकोनॉमी

भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों, ऊर्जा भंडारण प्रणालियों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बढ़ते उपयोग के कारण बैटरी अपशिष्ट में तेजी से वृद्धि हो रही है। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक देश में बैटरी कचरे की मात्रा लगभग 20 लाख मीट्रिक टन प्रतिवर्ष तक पहुंच सकती है। यदि समाप्त हो चुकी लिथियम-आयन बैटरियों का उचित निपटान नहीं किया जाए तो उन्हें खतरनाक अपशिष्ट की श्रेणी में रखा जाता है। इसलिए रीसाइक्लिंग न केवल पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक है, बल्कि यह सर्कुलर इकोनॉमी की अवधारणा को भी मजबूत करती है। सर्कुलर इकोनॉमी का उद्देश्य संसाधनों का पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण और अधिकतम पुनर्प्राप्ति सुनिश्चित करना है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • सीएसआईआर-राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की एक प्रमुख प्रयोगशाला है।
  • लिथियम, कोबाल्ट, निकल, मैंगनीज, तांबा, एल्यूमीनियम और ग्रेफाइट लिथियम-आयन बैटरियों से प्राप्त होने वाले प्रमुख पदार्थ हैं।
  • हाइड्रोमेटलर्जिकल रीसाइक्लिंग बैटरी अपशिष्ट से धातु निकालने की प्रमुख औद्योगिक तकनीकों में से एक है।
  • सर्कुलर इकोनॉमी संसाधनों के पुनः उपयोग और अपशिष्ट में कमी पर आधारित आर्थिक मॉडल है।

भारत में स्वदेशी बैटरी रीसाइक्लिंग तकनीकों का विकास ऊर्जा संक्रमण और हरित अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। सीएसआईआर-एनएमएल द्वारा किए गए ये समझौते महत्वपूर्ण खनिजों की घरेलू उपलब्धता बढ़ाने, पर्यावरणीय जोखिम कम करने और बैटरी अपशिष्ट प्रबंधन को अधिक वैज्ञानिक एवं टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

Originally written on June 20, 2026 and last modified on June 20, 2026.

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