भारत की नई सैन्य शक्ति का मास्टरप्लान और 2.8 लाख करोड़ का दांव
ग्लोबल पॉलिटिक्स की बिसात पर इस समय एक बहुत बड़ा बदलाव चल रहा है। दुनिया के नक्शे पर एक ओर जहां युद्ध और तनाव की नई लकीरें खिंच रही हैं, वहीं दूसरी ओर भारत अपने रक्षा तंत्र को पूरी तरह से बदलने के लिए एक ऐतिहासिक निवेश की नींव रख चुका है। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत का रक्षा पूंजीगत व्यय यानी डिफेंस कैपिटल एक्सपेंडिचर (डिफेंस के आधुनिकीकरण और नए हथियारों की खरीद पर होने वाला खर्च) साल 2030 तक सालाना 11 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ते हुए 2.8 लाख करोड़ रुपये (2.8 ट्रिलियन) के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। यह कोई सामान्य सरकारी खर्च नहीं है, बल्कि यह भारत के इतिहास का सबसे बड़ा ‘सैन्य आधुनिकीकरण अभियान’ है। इस भारी-भरकम बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशी कंपनियों की जेब में जाने के बजाय सीधे भारत के घरेलू उद्योगों, स्टार्टअप्स और मेक इन इंडिया मुहिम को मजबूत करने में इस्तेमाल होने वाला है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की यह कहानी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गेमचेंजर साबित हो रही है।
ऑपरेशन सिंदूर से बदला पूरी दुनिया का नजरिया
भारत के रक्षा इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जो न सिर्फ सीमाओं को सुरक्षित करती हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर देश की साख को एक अलग मुकाम पर ले जाती हैं। हाल ही में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने कुछ ऐसा ही करिश्मा कर दिखाया। इस सैन्य अभियान में भारतीय सेनाओं ने देश में ही बने मिसाइल सिस्टम, एयर डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और एंटी-ड्रोन तकनीकों का लाइव प्रदर्शन किया। इस ऑपरेशन की सफलता ने पूरी दुनिया को यह संदेश दे दिया कि भारत अब सिर्फ हथियार खरीदने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वह ऐसे आधुनिक और सटीक हथियार खुद बना सकता है जो युद्ध के मैदान में दुश्मनों को पस्त करने की पूरी ताकत रखते हैं। इस लाइव डिमॉन्स्ट्रेशन के बाद से ही वैश्विक स्तर पर भारतीय हथियारों की मांग में अप्रत्याशित उछाल आया है। कई देश अब भारत के स्वदेशी हथियारों को खरीदने के लिए कतार में खड़े हैं।

रक्षा निर्यात का 50 गुना बढ़ना और नया बिजनेस मॉडल
पिछले एक दशक में भारत के रक्षा निर्यात (डिफेंस एक्सपोर्ट) की कहानी किसी चमत्कार जैसी रही है। आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले 10 वर्षों में भारत का रक्षा निर्यात लगभग 50 गुना बढ़ चुका है। जहां साल 2013-14 में भारत महज 686 करोड़ रुपये के हथियारों का निर्यात करता था, वहीं साल 2025-26 में यह आंकड़ा रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। भारत सरकार ने अब साल 2029 तक सालाना रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये (500 बिलियन रुपये) तक पहुंचाने का एक बेहद महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। भारत के रक्षा क्षेत्र का यह नया बिजनेस मॉडल दो मुख्य स्तंभों पर टिका है:

कीमत और परफॉर्मेंस का तालमेल
भारतीय कंपनियों द्वारा बनाए जा रहे वेपन प्लेटफॉर्म्स न केवल अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे उतर रहे हैं, बल्कि पश्चिमी देशों के मुकाबले बेहद किफायती (कॉस्ट-कॉम्पिटिटिव) भी हैं।
नए वैश्विक बाजार
अब तक भारत के हथियारों का एक बड़ा खरीदार अमेरिका हुआ करता था, लेकिन अब आर्मेनिया, यूरोप और अफ्रीका के कई नए देश भारतीय डिफेंस प्रोडक्ट्स के प्रमुख खरीदार बनकर उभरे हैं।
घरेलू कंपनियों के लिए क्यों खुला है खजाना
डिफेंस कैपिटल एक्सपेंडिचर में होने वाली इस भारी बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा फायदा भारतीय शेयर बाजार में लिस्टेड और घरेलू रक्षा कंपनियों को मिल रहा है। सरकार ने ‘डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020’ और सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियों (पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट्स) के जरिए यह नियम अनिवार्य कर दिया है कि नए रक्षा सौदों में 50 प्रतिशत से अधिक सामग्री स्वदेशी होनी चाहिए। वित्त वर्ष 2026-27 के रक्षा बजट में भी इस दूरदर्शिता की साफ झलक मिलती है। सरकार ने कुल 7.85 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड रक्षा बजट में से 2.19 लाख करोड़ रुपये केवल कैपिटल आउटले यानी आधुनिकीकरण के लिए रखे हैं। सबसे खास बात यह है कि इस आधुनिकीकरण बजट का 75 प्रतिशत हिस्सा, यानी लगभग 1.39 लाख करोड़ रुपये केवल घरेलू रक्षा उद्योगों से खरीद के लिए आरक्षित (ईयरमार्क) किया गया है। यही वजह है कि घरेलू बाजार में भारतीय डिफेंस कंपनियों के ऑर्डर बुक पूरी तरह से भरे हुए हैं। वित्त वर्ष 2027 से 2029 के बीच ही लगभग 6.5 से 7 लाख करोड़ रुपये के नए ऑर्डर मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है।
ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक पर 2 लाख करोड़ का निवेश
आधुनिक युद्धों ने यह साबित कर दिया है कि अब लड़ाई सिर्फ टैंकों, तोपों या लड़ाकू विमानों से नहीं, बल्कि छोटे और घातक ड्रोनों से जीती जाएगी। ड्रोनों ने युद्ध के अर्थशास्त्र को पूरी तरह बदल दिया है। एक छोटा सा ड्रोन करोड़ों रुपये के टैंक को तबाह करने की क्षमता रखता है। इसी बदलाव को भांपते हुए भारत सरकार अगले एक दशक में एक बहुत बड़ा रणनीतिक निवेश करने जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर मिलिट्री ड्रोन का बाजार साल 2029 तक 75 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। भारत इस रेस में पीछे नहीं रहना चाहता, इसलिए अगले 10 वर्षों में भारत केवल ड्रोन टेक्नोलॉजी पर 25 से 30 अरब डॉलर (लगभग 2 लाख करोड़ से अधिक रुपये) और इन ड्रोनों को मार गिराने वाले काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर 4 से 5 अरब डॉलर खर्च करने की योजना बना रहा है। इसका सीधा फोकस देश की थल सेना, नौसेना और वायुसेना को पूरी तरह से डिजिटल और मानवरहित (अनमैन्ड) प्रणालियों से लैस करना है।
वैश्विक स्तर पर रक्षा खर्च के चौंकाने वाले आंकड़े
पूरी दुनिया में इस समय अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाने की एक अंधी दौड़ चल रही है, जिसके कुछ आंकड़े बेहद हैरान करने वाले हैं।
ग्लोबल मिलिट्री स्पेंडिंग का विस्फोट
10-20 साल पहले तक पूरी दुनिया का कुल रक्षा खर्च महज 600-700 अरब डॉलर के आसपास हुआ करता था, जो साल 2024 में बढ़कर 2.7 ट्रिलियन (लाख करोड़) डॉलर हो चुका है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) का अनुमान है कि साल 2035 तक यह वैश्विक खर्च बढ़कर 6.6 ट्रिलियन डॉलर को छू सकता है।
भारत का वैश्विक स्थान
भारत इस समय 84 अरब डॉलर के कुल रक्षा बजट के साथ दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश बन चुका है। पड़ोस में चीन और पाकिस्तान जैसे देशों की बढ़ती सैन्य गतिविधियों को देखते हुए भारत के लिए अपनी पुरानी पड़ चुकी सैन्य बुनियादी संरचनाओं को बदलना और आधुनिक तकनीक अपनाना बेहद जरूरी हो गया है।
भारतीय कंपनियों का मार्केट प्रीमियम
भारतीय रक्षा कंपनियों की तरक्की की रफ्तार इतनी तेज है कि वैश्विक स्तर पर वे अपनी विदेशी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के मुकाबले 50 प्रतिशत अधिक वैल्यूएशन प्रीमियम पर ट्रेड कर रही हैं। जहां वैश्विक रक्षा कंपनियों की रेवेन्यू ग्रोथ 11% के आसपास है, वहीं भारतीय कंपनियों की सालाना रेवेन्यू ग्रोथ 26% के करीब रहने का अनुमान है। भारत का 2.8 लाख करोड़ रुपये का यह आगामी रक्षा पूंजीगत व्यय केवल सीमाओं की सुरक्षा की गारंटी नहीं है, बल्कि यह देश को दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातक (इंपोर्टर) के ठप्पे से मुक्त कराकर एक आत्मनिर्भर और शक्तिशाली ‘डिफेंस एक्सपोर्टर’ बनाने की दिशा में उठाया गया सबसे मजबूत कदम है।