छोटे शहरों में क्यों आ रही है सोलर क्रांति और महानगर क्यों पिछड़ गए?
भारत में एक बड़ा और खामोश बदलाव आ रहा है। यह बदलाव दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु की चमचमाती गगनचुंबी इमारतों से नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के लखनऊ, महाराष्ट्र के जलगांव, गुजरात के भावनगर और राजस्थान के श्रीगंगानगर जैसे छोटे शहरों और कस्बों से शुरू हुआ है। भारत के ऊर्जा क्षेत्र में एक बहुत ही हैरान करने वाला ट्रेंड सामने आया है। घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाने यानी रूफटॉप सोलर अपनाने के मामले में भारत के छोटे शहरों और टियर-2 तथा टियर-3 कस्बों ने देश के सबसे बड़े महानगरों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। आमतौर पर माना जाता है कि कोई भी नई टेक्नोलॉजी या बड़ा बदलाव पहले महानगरों में आता है, लेकिन सोलर एनर्जी के मामले में कहानी पूरी तरह उलट चुकी है। देश में रूफटॉप सोलर लगाने की रफ्तार में जो 85% से ज्यादा की सालाना बढ़ोतरी देखी जा रही है, उसका असली इंजन देश के छोटे शहर बन चुके हैं।
महानगरों की ऊंची इमारतें और छोटे शहरों की खुली छतें
इस सोलर क्रांति में छोटे शहरों के आगे निकलने की सबसे बड़ी वजह बुनियादी ढांचे और मकानों की बनावट से जुड़ी है। दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में बहुमंजिला इमारतें (हाई-राइज अपार्टमेंट्स) और ग्रुप हाउसिंग सोसाइटियां ज्यादा हैं। इन सोसाइटियों में रहने वाले सैकड़ों परिवारों के पास खुद की कोई निजी छत नहीं होती। वहां की छतें साझा यानी कॉमन होती हैं, जहां पूरे अपार्टमेंट की सहमति के बिना सोलर पैनल लगाना कानूनी और व्यावहारिक रूप से बेहद जटिल हो जाता है। इसके उलट, छोटे शहरों और कस्बों की पूरी तस्वीर अलग है। वहां आज भी स्वतंत्र मकान (इंडिपेंडेंट हाउस) सबसे ज्यादा हैं। लोगों के पास अपनी खुद की खुली और बड़ी छतें हैं, जहां वे बिना किसी की अनुमति के आसानी से 3 से 4 किलोवाट का सोलर सिस्टम लगवा सकते हैं। सोलर पैनल लगाने के लिए जितनी सीधी धूप और खुली जगह की जरूरत होती है, वह छोटे शहरों के इन स्वतंत्र मकानों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

बिजली के महंगे बिलों से मुक्ति का गणित
एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए महीने का बजट संभालना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। छोटे शहरों में गर्मियों के दिनों में जब एसी, कूलर और पंखे लगातार चलते हैं, तो बिजली का बिल आम परिवारों की कमर तोड़ देता है। बिजली कंपनियों (डिस्कॉम) द्वारा टैरिफ में लगातार की जा रही बढ़ोतरी ने लोगों को एक परमानेंट समाधान ढूंढने पर मजबूर किया। छोटे शहरों के उपभोक्ताओं ने बहुत जल्द यह समझ लिया कि सोलर पैनल पर एक बार किया गया निवेश उन्हें अगले 25 सालों के लिए भारी-भरकम बिजली बिलों से पूरी तरह आज़ाद कर सकता है। जब लोगों ने देखा कि धूप से बनने वाली बिजली उनके घर की जरूरतों को पूरा कर रही है और नेट मीटरिंग के जरिए बची हुई बिजली वापस ग्रिड में जा रही है, जिससे उनका बिल शून्य (जीरो) हो जा रहा है, तो इस बदलाव ने एक आंदोलन का रूप ले लिया।

पीएम सूर्य घर योजना और सब्सिडी का बूस्टर डोज
इस सोलर क्रांति को सबसे बड़ी रफ्तार सरकार की ‘प्रधानमंत्री सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना’ से मिली है। इस योजना ने सोलर पैनल लगवाने के शुरुआती खर्च को बहुत कम कर दिया है। 3 किलोवाट तक के रूफटॉप सोलर सिस्टम के लिए केंद्र सरकार की तरफ से 78,000 रुपये तक की बड़ी सब्सिडी दी जा रही है। उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों ने तो इसके ऊपर अपनी तरफ से अतिरिक्त वित्तीय सहायता भी जोड़ दी है। इसके अलावा, बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा बिना किसी कोलैटरल (बिना कुछ गिरवी रखे) बेहद कम ब्याज दरों पर लोन की सुविधा दी गई है। इस आसान फाइनेंसिंग मॉडल की वजह से अब छोटे शहरों के परिवारों को एक साथ बड़ी रकम खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती। वे ईएमआई के जरिए आसानी से भुगतान कर रहे हैं और यह ईएमआई भी उनके पुराने बिजली बिल से कम बैठती है।
देश के टॉप सोलर जिलों की जमीनी हकीकत
अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो भारत के टॉप 50 रूफटॉप सोलर जिलों की सूची में मेट्रो शहरों का नाम खोजना मुश्किल है। इस सूची में गुजरात के सूरत, मेहसाणा, जूनागढ़; महाराष्ट्र के नागपुर, अमरावती, छत्रपति संभाजीनगर; उत्तर प्रदेश के वाराणसी और लखनऊ; और केरल के त्रिशूर तथा अलappुझा जैसे जिले सबसे आगे चल रहे हैं। इन राज्यों में बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) ने जिला स्तर पर विशेष टीमें बनाकर जागरूकता अभियान चलाए हैं। स्थानीय स्तर पर वेंडर्स की उपलब्धता और सरकारी पोर्टल के जरिए ऑनलाइन आवेदन और अप्रूवल की प्रक्रिया को आसान बनाए जाने से लोगों का भरोसा इस तकनीक पर बहुत तेजी से बढ़ा है।
भारत के सोलर मार्केट का भविष्य और कमाई के नए मौके
इस समय भारत में करीब 30 करोड़ से अधिक परिवार योग्य मकानों में रहते हैं, लेकिन अभी तक केवल 40 लाख से अधिक घरों में ही रूफटॉप सोलर लग पाया है। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में इस सेक्टर में विकास की असीम संभावनाएं हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, साल 2030 तक भारत में रूफटॉप सोलर का कुल बाजार 2.5 लाख करोड़ रुपये से बड़ा होने का अनुमान है। इस बड़े बदलाव ने केवल बिजली ही मुफ्त नहीं की है, बल्कि छोटे शहरों में रोजगार के भी लाखों नए अवसर पैदा किए हैं। सोलर पैनल की मैन्युफैक्चरिंग से लेकर उनकी डिलीवरी, इंस्टॉलेशन, वायरिंग और मेंटेनेंस के लिए स्थानीय स्तर पर हजारों युवाओं को ‘सौर मित्र’ के रूप में कुशल बनाया जा रहा है।
सोलर एनर्जी से जुड़े कुछ बेहद दिलचस्प और अनसुने तथ्य
दुनिया का पहला सोलर सेल
साल 1883 में चार्ल्स फ्रिट्स ने सेलेनियम का उपयोग करके दुनिया का पहला कामकाजी सोलर सेल बनाया था, हालांकि इसकी ऊर्जा क्षमता मात्र 1% थी। आज के आधुनिक सिलिकॉन पैनल 20% से अधिक क्षमता के साथ काम करते हैं।
अंतरिक्ष में सोलर पावर
अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले सैटेलाइट्स और इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पूरी तरह से सोलर एनर्जी पर ही निर्भर होते हैं। स्पेस स्टेशन पर लगे सोलर विंग्स इतने विशाल हैं कि वे एक फुटबॉल मैदान के बराबर जगह घेरते हैं।
सोलर पैनल की लंबी उम्र
सोलर पैनल में कोई भी हिलने-डुलने वाला पुर्जा (मूविंग पार्ट) नहीं होता, यही वजह है कि इनकी उम्र बहुत लंबी होती है। अधिकांश सोलर पैनल 25 साल की वारंटी के साथ आते हैं, लेकिन वे 30 से 40 साल बाद भी 70% से अधिक क्षमता के साथ बिजली बनाना जारी रख सकते हैं।
पर्यावरण को बहुत बड़ी राहत
एक सामान्य घर में लगाया गया 3 किलोवाट का सोलर सिस्टम अपने पूरे जीवनकाल में लगभग 70 से 80 टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को रोकता है, जो कि सैकड़ों पेड़ लगाने के बराबर पर्यावरणीय योगदान है।