राष्ट्रीय राजमार्ग अधिग्रहण कानून में बदलाव की जरूरत पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 के तहत भूमि मुआवजा विवादों का निपटारा नौकरशाहों के हाथ में रहने पर गंभीर आपत्ति जताई है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों का फैसला न्यायिक प्रशिक्षण प्राप्त अधिकारियों को करना चाहिए, क्योंकि मुआवजे, मूल्यांकन और वैधानिक लाभों से जुड़े विवाद केवल प्रशासनिक दृष्टि से नहीं सुलझाए जा सकते।
क्यों उठी कानून में संशोधन की मांग
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन शामिल थे, ने केंद्र सरकार से इस कानून में संशोधन पर विचार करने को कहा। अदालत की राय थी कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत भूमि अधिग्रहण विवादों में मौजूदा व्यवस्था भूमि मालिकों को प्रणालीगत नुकसान पहुंचाती है।पीठ ने यह भी कहा कि अन्य भूमि अधिग्रहण कानूनों के तहत ऐसे विवाद आमतौर पर न्यायिक रूप से प्रशिक्षित प्राधिकारियों द्वारा तय किए जाते हैं, जबकि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम एक अपवाद बना हुआ है।
मुआवजे के विवाद में क्या है समस्या
भूमि अधिग्रहण मामलों में मुआवजा केवल जमीन की बाजार कीमत तक सीमित नहीं होता। इसमें सोलैटियम और ब्याज जैसे वैधानिक लाभ भी शामिल हो सकते हैं। सोलैटियम भूमि अधिग्रहण के बदले दिया जाने वाला अतिरिक्त भुगतान है, जबकि निर्धारित परिस्थितियों में देरी होने पर ब्याज भी देय होता है।सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे स्थित भूमि का बाजार मूल्य कई बार अंदरूनी कृषि भूमि की तुलना में अधिक होता है। ऐसे में मूल्यांकन का विवाद जटिल हो जाता है और केवल प्रशासनिक अधिकारी के स्तर पर इसका निपटारा पर्याप्त नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि कुछ मामलों में किसानों को सोलैटियम और ब्याज से वंचित रखा गया, जिसके बाद न्यायिक हस्तक्षेप करना पड़ा।
सरकार की भूमिका और आगे की प्रक्रिया
केंद्र सरकार ने अदालत को बताया है कि वह राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 में संशोधन पर गंभीरता से विचार कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह सरकार के निर्णय का इंतजार करेगा। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश में सड़क अवसंरचना के विस्तार के साथ भूमि अधिग्रहण और उचित मुआवजे का मुद्दा लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 एक केंद्रीय कानून है, जो राष्ट्रीय राजमार्गों की घोषणा, अधिग्रहण और रखरखाव से जुड़ा है।
- भूमि अधिग्रहण मामलों में सोलैटियम मुआवजे के अतिरिक्त दिया जाने वाला वैधानिक भुगतान है।
- सुप्रीम कोर्ट भारत का सर्वोच्च न्यायालय है और संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत कार्य करता है।
- अन्य कई भूमि अधिग्रहण कानूनों में विवादों का निपटारा न्यायिक रूप से प्रशिक्षित प्राधिकारियों द्वारा किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में भूमि मालिकों के अधिकार, मुआवजे की निष्पक्षता और न्यायिक निगरानी की जरूरत को फिर से केंद्र में लाती है। अब निगाहें केंद्र सरकार के संभावित संशोधन पर टिकी हैं।