राष्ट्रपति ने सम्मानित की भारत की बुनकरी परंपरा, 22 हस्तशिल्पी हुए पुरस्कृत

राष्ट्रपति ने सम्मानित की भारत की बुनकरी परंपरा, 22 हस्तशिल्पी हुए पुरस्कृत

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार 2025 प्रदान किए। इस समारोह में कुल 22 पुरस्कार दिए गए, जिनमें 3 संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और 19 राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार शामिल रहे। इन सम्मानों के जरिए देश की पारंपरिक बुनकरी, नवाचार और विरासत संरक्षण को मान्यता दी गई।

संत कबीर पुरस्कार से सम्मानित कारीगर

संत कबीर हथकरघा पुरस्कार भारत के हथकरघा क्षेत्र के सर्वोच्च सम्मानों में गिना जाता है। 2025 में यह पुरस्कार ओडिशा के राम मेहर को बिचितपर खादी साड़ी के लिए, असम की रुणिमा चेतीया चौधरी को मुगा सिल्क साड़ी के लिए और उत्तर प्रदेश के शाह मुहम्मद अंसारी को जरबफ्त शेवताम्बरी अवध जामदानी साड़ी के लिए दिया गया। इन कृतियों में पारंपरिक तकनीक, स्थानीय पहचान और उत्कृष्ट शिल्प कौशल की झलक मिलती है।

राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार और क्षेत्रीय बुनकर परंपराएं

राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार देशभर के उन बुनकरों और कारीगरों को दिए जाते हैं, जिन्होंने हथकरघा क्षेत्र में विशिष्ट योगदान दिया है। इस वर्ष सम्मानित कृतियों में तमिलनाडु की कांजीवरम सिल्क, तेलंगाना की इकत और जम्मू-कश्मीर की कानी शॉल जैसी प्रसिद्ध क्षेत्रीय बुनकर परंपराएं भी शामिल रहीं। यह दर्शाता है कि भारत का हथकरघा क्षेत्र केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण आधार है।

डाक टिकट और पुस्तक से विरासत को नई पहचान

समारोह के दौरान राष्ट्रपति ने भारत की बुनकरी परंपराओं पर आधारित चार स्मारक डाक टिकट भी जारी किए। इसके साथ ही Earth. Root. Thread – Aal Dyed Handloom Textiles of Central India नामक पुस्तक का विमोचन किया गया। यह पुस्तक हथकरघा विकास आयुक्त कार्यालय द्वारा तैयार की गई है, जो वस्त्र मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। ऐसे प्रकाशन और स्मारक जारी करना पारंपरिक शिल्प को दस्तावेज़ी रूप देने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण तरीका माना जाता है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • राष्ट्रीय हथकरघा दिवस हर साल 7 अगस्त को मनाया जाता है।
  • 7 अगस्त की तिथि 1905 के स्वदेशी आंदोलन से जुड़ी हुई है।
  • हथकरघा भारत की पारंपरिक कुटीर-आधारित वस्त्र गतिविधि है, जिसमें मैनुअल लूम का उपयोग होता है।
  • मुगा सिल्क असम से जुड़ी एक प्राकृतिक रेशम किस्म है।

इस आयोजन ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि भारतीय हथकरघा केवल परिधान या वस्त्र उद्योग का हिस्सा नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक स्मृति, ग्रामीण आजीविका और शिल्प परंपरा का जीवंत प्रतीक है।

Originally written on August 8, 2026 and last modified on August 8, 2026.

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