मिलेट्स अचानक भारत में इतने ‘कूल’ और महंगे कैसे बन गए?
आज से कुछ दशक पहले तक भारतीय थाली में ज्वार, बाजरा, रागी और कंगनी जैसे मोटे अनाज बेहद आम हुआ करते थे। ग्रामीण इलाकों में इसे गरीबों का भोजन माना जाता था, जबकि शहरों के लोग धीरे-धीरे सफेद चावल और रिफाइंड गेहूं (मैदा) की तरफ बढ़ रहे थे। लेकिन पिछले कुछ सालों में एक बड़ा बदलाव आया है। जो अनाज कभी खेतों के कोनों में उपेक्षित पड़ा रहता था, वह आज फाइव-स्टार होटलों के मेन्यू, महंगे सुपरमार्केट्स के शेल्फ और फिटनेस इन्फ्लुएंसर्स की इंस्टाग्राम रील्स पर राज कर रहा है। रागी के बिस्कुट, बाजरे के नूडल्स और ज्वार के पास्ता अब प्रीमियम दामों पर बिक रहे हैं। आखिर यह बदलाव कैसे आया? कैसे एक साधारण सा मोटा अनाज अचानक भारत के शहरी मध्यमवर्ग के लिए एक स्टेटस सिंबल बन गया? इसके पीछे कोई तुक्का नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रीब्रांडिंग, मार्केटिंग साइकोलॉजी और बदलती लाइफस्टाइल का पूरा बिजनेस मॉडल काम कर रहा है।
सुपरफूड का टैग और मार्केटिंग का खेल
किसी भी साधारण चीज को प्रीमियम बनाने का सबसे आसान तरीका है उसे ‘सुपरफूड’ घोषित कर देना। अमेरिकी और यूरोपीय बाजारों में जब क्विनोआ (Quinoa) को सुपरफूड बनाकर महंगे दामों पर बेचा गया, तो भारतीय मार्केटियर्स को समझ आया कि भारत के पास तो ऐसे कई अनाज पहले से मौजूद हैं। मिलेट्स (Millets) को जब ‘मोटा अनाज’ कहा जाता था, तो उसमें एक पिछड़ापन झलकता था। लेकिन जैसे ही इसे ‘न्यूट्रि-सीरियल्स’ (Nutri-Cereals) और ‘एंशिएंट ग्रेन्स’ (Ancient Grains) जैसे अंग्रेजी भारी-भरकम शब्दों से नवाजा गया, इसकी ब्रांड वैल्यू रातों-रात बदल गई। कंपनियों ने पैकेजों पर ‘ग्लूटेन-फ्री’, ‘हाई-फाइबर’, और ‘लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स’ जैसे टर्म्स छापने शुरू कर दिए। शहरी उपभोक्ता, जो पहले से ही डायबिटीज, मोटापा और थायराइड जैसी लाइफस्टाइल बीमारियों से परेशान था, उसने इसे एक जादुई समाधान की तरह देखा और इसके लिए दोगुनी-तिगुनी कीमत देने को तैयार हो गया।
लाइफस्टाइल की बीमारी और डर का बिजनेस
फास्ट फूड और अत्यधिक प्रोसेस्ड व्हीट (गेहूं) के सेवन ने शहरी आबादी में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ा दी हैं। आज भारत को दुनिया की ‘डायबिटीज कैपिटल’ कहा जाता है। इसी डर और स्वास्थ्य चेतना ने मिलेट्स के बाजार को तैयार किया। सफेद चावल और गेहूं की तुलना में मिलेट्स का पाचन धीरे-धीरे होता है, जिससे शरीर में ब्लड शुगर का स्तर अचानक नहीं बढ़ता। इस वैज्ञानिक तथ्य को कंपनियों ने अपनी मार्केटिंग स्ट्रेटजी का मुख्य हिस्सा बनाया। जब एक आम उपभोक्ता को यह समझ आता है कि गेहूं की रोटी खाने से उसकी शुगर बढ़ सकती है, लेकिन ज्वार या बाजरे की रोटी से यह नियंत्रित रहेगी, तो वह कीमत की परवाह किए बिना मिलेट्स की तरफ शिफ्ट होता है। यह सीधे तौर पर ‘फियर मार्केटिंग’ और ‘हेल्थ कॉन्शियसनेस’ का एक बेहतरीन कॉम्बिनेशन है।
सरकार की तरफ से मिला सबसे बड़ा पुश
किसी भी प्रोडक्ट को ग्लोबल बनाने के लिए सरकारी समर्थन की जरूरत होती है, और मिलेट्स को यह समर्थन बहुत बड़े पैमाने पर मिला। भारत सरकार के प्रस्ताव पर ही संयुक्त राष्ट्र (UN) ने साल 2023 को ‘इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स’ (IYM 2023) घोषित किया था। इसके बाद बड़े-बड़े सरकारी आयोजनों, जी-20 समिट के भोज और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिलेट्स से बने व्यंजनों को परोसा गया। जब देश के प्रधानमंत्री और दुनिया के बड़े नेता बाजरे की खिचड़ी और रागी के डोसे की तारीफ करते हैं, तो आम जनता के बीच उसकी साख अपने आप बढ़ जाती है। सरकारी प्रचार ने इसे केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि ‘राष्ट्रवाद’ और ‘भारतीय संस्कृति के गौरव’ से भी जोड़ दिया, जिससे इसकी स्वीकार्यता तेजी से बढ़ी।
रेडी-टू-ईट मार्केट और एफएमसीजी कंपनियों का दांव
शुरुआत में मिलेट्स के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इन्हें पकाना थोड़ा मुश्किल और समय लेने वाला काम होता है। आधुनिक कामकाजी पीढ़ी के पास इतना समय नहीं है कि वह बाजरे को कूटकर या रात भर भिगोकर उसकी पारंपरिक रेसिपी तैयार करे। बड़ी एफएमसीजी (FMCG) कंपनियों ने इसी गैप को पहचाना। आईटीसी, टाटा, ब्रिटानिया और नेस्ले जैसी बड़ी कंपनियों ने मिलेट्स को ‘रेडी-टू-ईट’ और ‘रेडी-टू-कुक’ फॉर्मेट में पेश कर दिया। आज बाजार में रागी चोकोस, बाजरा पफ्स, ज्वार नूडल्स, और मिलेट उपमा मिक्स आसानी से उपलब्ध हैं। कंपनियों ने मिलेट्स के स्वास्थ्य लाभों को आधुनिक स्वाद और सुविधा के साथ मिला दिया। अब उपभोक्ता को अपनी जीभ का स्वाद भी नहीं बदलना पड़ता और उसे स्वास्थ्य का संतोष भी मिल जाता है।
मिलेट्स का पर्यावरण और इकोनॉमी कनेक्शन
मिलेट्स का यह नया अवतार सिर्फ इंसानी सेहत के लिए ही नहीं, बल्कि बदलते मौसम और पर्यावरण के लिहाज से भी एक बड़ी जरूरत बन चुका है। भारत की कृषि व्यवस्था लंबे समय से धान और गेहूं के चक्र में फंसी हुई थी, जिसके लिए अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है।
मिलेट्स और धान-गेहूं की खेती की तुलना
| विशेषता | मिलेट्स (ज्वार, बाजरा, रागी) | धान (चावल) / गेहूं |
| पानी की आवश्यकता | बेहद कम (सूखे में भी संभव) | बहुत अधिक (लगातार सिंचाई जरूरी) |
| मिट्टी की गुणवत्ता | बंजर और कम उपजाऊ जमीन पर भी संभव | अत्यधिक उपजाऊ और उपजाऊ रसायनों की जरूरत |
| कीटनाशकों का प्रयोग | ना के बराबर (कीट प्रतिरोधी) | भारी मात्रा में पेस्टिसाइड्स की जरूरत |
| कार्बन फुटप्रिंट | बहुत कम | मीथेन उत्सर्जन के कारण अधिक |
इस तुलना से साफ है कि जैसे-जैसे पानी का संकट बढ़ रहा है, मिलेट्स की खेती किसानों के लिए एक किफायती और सुरक्षित विकल्प बनती जा रही है। यही कारण है कि कॉर्पोरेट घराने अब सस्टेनेबिलिटी (Sustainability) के नाम पर भी मिलेट्स को प्रमोट कर रहे हैं, जिससे उनकी ब्रांड इमेज और बेहतर होती है।
इस ट्रेंडी बिजनेस के पीछे की कुछ कड़वी सच्चाइयां
हर बड़े बिजनेस ट्रेंड की तरह मिलेट्स के इस ‘कूल’ होने के पीछे भी कुछ ऐसी बातें हैं जो अक्सर विज्ञापनों में नहीं दिखाई जातीं। सबसे बड़ी बात यह है कि जो अनाज कभी सबसे सस्ता हुआ करता था, वह अब आम गरीब आदमी की थाली से दूर होता जा रहा है। प्रीमियम पैकेजिंग और ब्रांडिंग के कारण इसकी कीमतें आसमान छू रही हैं। इसके अलावा, बाजार में मिलने वाले कई ‘मिलेट प्रोडक्ट्स’ में असल मिलेट्स की मात्रा केवल 5% से 10% होती है, जबकि बाकी हिस्सा मैदा, चीनी और पाम ऑयल का ही होता है। उपभोक्ता ‘मिलेट’ नाम देखकर उसे हेल्दी समझकर खरीद लेता है, जो कि एक तरह की ‘ग्रीनवाशिंग’ या ‘हेल्थवाशिंग’ मार्केटिंग ट्रिक है।
मिलेट्स से जुड़े कुछ अनोखे और दिलचस्प फैक्ट्स
- अंतरिक्ष का भोजन: रागी और बाजरे जैसे अनाजों पर वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं ताकि इन्हें भविष्य में अंतरिक्ष मिशनों के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों के भोजन का हिस्सा बनाया जा सके, क्योंकि ये कम जगह में अधिक पोषण देते हैं।
- हजारों साल पुराना इतिहास: सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) की खुदाई के दौरान भी मिलेट्स के अवशेष मिले थे, जिससे साबित होता है कि यह भारत का असली और मूल अनाज है।
- खराब न होने वाला अनाज: कुछ मिलेट्स की शेल्फ-लाइफ इतनी अधिक होती है कि इन्हें अगर सही तरीके से स्टोर किया जाए, तो ये कई सालों तक बिना किसी केमिकल के भी खराब नहीं होते।