मधुमेह के घावों के इलाज में पौधों से बनी नई दवा की दिशा
हैदराबाद स्थित सीएसआईआर-भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान (CSIR-IICT) के वैज्ञानिकों ने डायबिटिक फुट अल्सर के लिए एक पौधों पर आधारित फाइटोफार्मास्युटिकल दवा उम्मीदवार विकसित किया है। यह उम्मीदवार Gymnema sylvestre नामक औषधीय पौधे से तैयार किया गया है, जिसे भारत में गुरमार या पोडापत्री के नाम से जाना जाता है। प्री-क्लिनिकल परीक्षणों के बाद यह दवा उम्मीदवार अब IND-ready चरण तक पहुंच गया है, यानी मानव परीक्षण शुरू होने से पहले आवश्यक प्रारंभिक वैज्ञानिक और सुरक्षा प्रक्रियाएं पूरी कर ली गई हैं।
डायबिटिक फुट अल्सर क्यों है गंभीर समस्या
डायबिटिक फुट अल्सर मधुमेह से पीड़ित लोगों में पैरों पर बनने वाले ऐसे घाव होते हैं, जो अक्सर तंत्रिका क्षति, खराब रक्त संचार और धीमी घाव भरने की प्रक्रिया के कारण विकसित होते हैं। यह मधुमेह की सबसे आम और जटिल दीर्घकालिक समस्याओं में से एक मानी जाती है। कई मामलों में इन घावों के लिए लंबे समय तक देखभाल, संक्रमण नियंत्रण और रक्त शर्करा प्रबंधन की जरूरत पड़ती है।
इसी कारण ऐसे उपचारों की मांग बढ़ रही है जो सुरक्षित होने के साथ-साथ प्रभावी भी हों। पौधों से बनी दवाओं पर शोध इस दिशा में एक महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है, क्योंकि इनमें पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक परीक्षण दोनों का संयोजन होता है।
पौधों से दवा बनाने की वैज्ञानिक प्रक्रिया
CSIR-IICT की इस परियोजना में केवल पौधे का उपयोग भर नहीं किया गया, बल्कि उसे दवा विकास की मानक वैज्ञानिक प्रक्रिया से गुजारा गया। इसमें वनस्पति मानकीकरण, औषधीय मूल्यांकन, GLP-अनुपालक सुरक्षा अध्ययन और फार्माकोकाइनेटिक आकलन शामिल रहे। इन चरणों के बाद ही किसी उम्मीदवार को आगे के नैदानिक परीक्षणों के लिए तैयार माना जाता है।
यह शोध संस्थान के विभाग Department of Applied Biology में डॉ. एंथनी एडलगट्टा के नेतृत्व में किया गया। डॉ. स्रिगिरिधर कोटामराजू और डॉ. अरुणा जंगम भी इस कार्य में प्रमुख शोधकर्ताओं में शामिल रहे।
उद्योग साझेदारी और पेटेंट सुरक्षा
इस तकनीक को आगे बढ़ाने के लिए CSIR-IICT ने मुंबई की Viridis Biopharma Pvt. Ltd. के साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौता किया है। इसका उद्देश्य आगे के क्लिनिकल विकास और नियामकीय प्रक्रियाओं को गति देना है। साथ ही, इस तकनीक को भारत और अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रों में पेटेंट सुरक्षा भी मिली है, जिससे इसके व्यावसायिक और शोध उपयोग की संभावनाएं मजबूत हुई हैं।
इस परियोजना को CSIR Phytopharmaceutical Mission के Phase III के तहत समर्थन मिला है। यह मिशन भारतीय औषधीय पौधों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित, परीक्षण-आधारित उत्पादों में बदलने पर केंद्रित है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- Gymnema sylvestre को भारत में गुरमार और पोडापत्री कहा जाता है और यह पारंपरिक औषधीय उपयोग के लिए जाना जाता है।
- IND-ready का अर्थ है कि दवा उम्मीदवार मानव क्लिनिकल ट्रायल से पहले आवश्यक प्री-क्लिनिकल चरण पूरा कर चुका है।
- GLP यानी Good Laboratory Practice, गैर-नैदानिक सुरक्षा अध्ययनों के लिए गुणवत्ता मानक है।
- CSIR-IICT सीएसआईआर की एक प्रयोगशाला है और यह हैदराबाद, तेलंगाना में स्थित है।
यह उपलब्धि दिखाती है कि भारत में पारंपरिक औषधीय पौधों को आधुनिक दवा विकास के वैज्ञानिक ढांचे में लाकर नई चिकित्सीय संभावनाएं तैयार की जा रही हैं। डायबिटिक फुट अल्सर जैसे जटिल रोगों के लिए यह शोध भविष्य में अधिक प्रभावी उपचार विकल्पों की राह खोल सकता है।