भारत की परमाणु ऊर्जा रणनीति में आत्मनिर्भरता की नई रूपरेखा
भारत ने 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य तय करते हुए अपने परमाणु कार्यक्रम को नई दिशा दी है। इस रोडमैप में बड़े स्वदेशी प्रेशराइज़्ड हेवी वाटर रिएक्टरों के साथ-साथ छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों को भी अहम स्थान दिया गया है। खास बात यह है कि नई योजना केवल क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि घरेलू निर्माण, निजी भागीदारी, तकनीकी स्वावलंबन और भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को एक साथ साधने की कोशिश करती है।
2047 तक 100 गीगावॉट का लक्ष्य क्यों अहम है
न्यूक्लियर एनर्जी मिशन के तहत तय किया गया 100 GWe का लक्ष्य भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है। देश में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने के लिए परमाणु ऊर्जा को एक स्थिर, कम-कार्बन विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। सरकार ने यह भी तय किया है कि 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर विकसित और चालू किए जाएं। इसके लिए ₹20,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
इस योजना में दो तरह की तैनाती पर जोर है। ग्रीनफील्ड साइटों पर बड़े प्रेशराइज़्ड हेवी वाटर रिएक्टर लगाए जाएंगे, जबकि ब्राउनफील्ड साइटों पर, खासकर उन स्थानों पर जहां जीवाश्म ईंधन आधारित संयंत्र बंद हो रहे हैं, छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर स्थापित किए जा सकते हैं। इससे मौजूदा औद्योगिक ढांचे का बेहतर उपयोग संभव होगा।
स्वदेशी रिएक्टर डिजाइन और तकनीकी तैयारी
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र इस कार्यक्रम के लिए कई घरेलू रिएक्टर डिजाइनों पर काम कर रहा है। इनमें 220 मेगावॉट इलेक्ट्रिक भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर, 55 मेगावॉट का SMR-55 और हाइड्रोजन उत्पादन के लिए 5 मेगावॉट थर्मल तक का हाई टेम्परेचर गैस कूल्ड रिएक्टर शामिल है। छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों की खासियत यह है कि इन्हें फैक्ट्री-आधारित निर्माण, मॉड्यूलर तैनाती और चरणबद्ध क्षमता वृद्धि के लिए तैयार किया जाता है।
हाई टेम्परेचर गैस कूल्ड रिएक्टरों में हीलियम या किसी अन्य निष्क्रिय गैस का उपयोग कूलेंट के रूप में होता है और ये ऊंचे तापमान पर काम करते हैं। ऐसे रिएक्टरों से औद्योगिक उपयोग के लिए हाइड्रोजन उत्पादन की संभावना भी जुड़ती है, जो भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा रणनीति में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
कानूनी ढांचा, निजी भागीदारी और नियामक सवाल
दिसंबर 2025 में पारित Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India Act ने इस रोडमैप के लिए कानूनी आधार तैयार किया। इस कानून ने क्षेत्र में राज्य के एकाधिकार को समाप्त किया और घरेलू निजी भागीदारी के साथ-साथ 49% तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी। इसका उद्देश्य परमाणु क्षेत्र में पूंजी, तकनीक और औद्योगिक क्षमता को बढ़ाना है।
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र भारतीय उद्योगों के साथ तकनीक हस्तांतरण और ज्ञान-साझेदारी भी कर रहा है, ताकि छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों के घटकों का स्थानीय निर्माण संभव हो सके। जुलाई 2026 में नीति आयोग ने इस कानून से जुड़े मसौदा नियमों, नियामक ढांचे और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला की जरूरतों पर हितधारकों से चर्चा की।
इसी बीच, फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने SHANTI Act से जुड़े एक याचिका पर सुनवाई की, जिसमें देयता सीमा और सुरक्षा प्रावधानों को चुनौती दी गई थी। कानून में लगभग ₹3,900 करोड़ की देयता सीमा का प्रावधान है, जिस पर सुरक्षा और जवाबदेही को लेकर बहस जारी है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- प्रेशराइज़्ड हेवी वाटर रिएक्टर भारत के स्वदेशी परमाणु कार्यक्रम की प्रमुख रिएक्टर श्रेणी माने जाते हैं।
- छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर कम क्षमता वाले, मॉड्यूलर और चरणबद्ध निर्माण के लिए डिजाइन किए जाते हैं।
- भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र भारत का प्रमुख परमाणु अनुसंधान संस्थान है।
- हाई टेम्परेचर गैस कूल्ड रिएक्टरों का उपयोग औद्योगिक ताप और हाइड्रोजन उत्पादन जैसे कार्यों में किया जा सकता है।
भारत की यह रणनीति परमाणु ऊर्जा को केवल बिजली उत्पादन के साधन के रूप में नहीं, बल्कि औद्योगिक नवाचार, स्वदेशी निर्माण और ऊर्जा आत्मनिर्भरता के व्यापक मंच के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।