भारत का पहला मिट्टी बनावट मानचित्र कृषि योजना में नई सटीकता लाएगा

भारत का पहला मिट्टी बनावट मानचित्र कृषि योजना में नई सटीकता लाएगा

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तहत नागपुर स्थित राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग योजना ब्यूरो (एनबीएसएस एंड एलयूपी) ने भारत का पहला मिट्टी बनावट मानचित्र तैयार किया है। यह मानचित्र देशभर के लिए हेक्टेयर स्तर पर डिजिटाइज्ड मृदा वर्गीकरण डेटा उपलब्ध कराता है और 16 जुलाई 2026 को जारी किया गया।

मिट्टी बनावट क्यों है महत्वपूर्ण

मिट्टी बनावट से आशय किसी मिट्टी में रेत, गाद और चिकनी मिट्टी के अनुपात से है। यह मिट्टी की एक मूल भौतिक विशेषता मानी जाती है, जिसके आधार पर भूमि उपयोग, सिंचाई व्यवस्था और फसल उपयुक्तता का आकलन किया जाता है। अलग-अलग बनावट वाली मिट्टी में जल धारण क्षमता, पोषक तत्वों का व्यवहार और जड़ों की वृद्धि अलग तरह से प्रभावित होती है।

डिजिटल तकनीक से तैयार हुआ मानचित्र

इस मानचित्र को तैयार करने में फील्ड स्टडी, रिमोट सेंसिंग, सैटेलाइट इमेजरी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग किया गया। आधुनिक मृदा सर्वेक्षण में इन तकनीकों की मदद से जमीन पर किए गए अवलोकनों को जियोस्पेशियल विश्लेषण और डिजिटल वर्गीकरण से जोड़ा जाता है। इससे बड़े क्षेत्र का अधिक सटीक और उपयोगी मृदा डेटा तैयार किया जा सकता है।

किसानों और प्रशासन को क्या लाभ

यह मानचित्र किसानों को उनके खेत की मिट्टी के अनुसार उपयुक्त फसल चुनने में मदद करेगा। साथ ही, ग्राम-स्तरीय डेटा होने से कृषि योजना, फसल उपयुक्तता मानचित्रण और संसाधनों के बेहतर आवंटन में सरकारी एजेंसियों को भी सहायता मिलेगी। भारत जैसे देश में, जहां खेत छोटे हैं और कुछ ही दूरी पर मिट्टी की प्रकृति बदल जाती है, ऐसी सूक्ष्म जानकारी बेहद उपयोगी मानी जाती है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • एनबीएसएस एंड एलयूपी आईसीएआर के अधीन एक राष्ट्रीय संस्थान है और इसका मुख्यालय नागपुर, महाराष्ट्र में है।
  • मिट्टी बनावट का निर्धारण रेत, गाद और चिकनी मिट्टी के अनुपात से किया जाता है।
  • भारत का पहला मृदा गहराई मानचित्र इससे एक वर्ष पहले जारी किया गया था।
  • एनबीएसएस एंड एलयूपी को 1976 में आधिकारिक दर्जा मिला था और 2026 में इसके 50 वर्ष पूरे हुए।

संस्थान का अगला फोकस मिट्टी की जल धारण और अवशोषण क्षमता का मानचित्रण है, जिसमें महाराष्ट्र और दक्षिण भारत पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। यह पहल भारतीय कृषि को अधिक वैज्ञानिक और क्षेत्र-विशिष्ट बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

Originally written on August 22, 2026 and last modified on August 22, 2026.

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