भारत का परमाणु शस्त्रागार और रणनीतिक प्रतिरोधक क्षमता
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) के अनुसार जनवरी 2026 तक भारत के पास लगभग 190 परमाणु वारहेड होने का अनुमान लगाया गया है। यह अनुमान भारत को उन नौ परमाणु-सशस्त्र देशों में शामिल करता है जिन्हें वैश्विक हथियार नियंत्रण अध्ययनों में मान्यता प्राप्त है। भारत की परमाणु नीति न्यूनतम विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता और ‘पहले उपयोग नहीं’ के सिद्धांत पर आधारित है, जो उसकी आधिकारिक परमाणु रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारत की परमाणु प्रतिरोधक संरचना
भारत ने अपनी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को तीन प्रमुख माध्यमों पर आधारित किया है—वायु, भूमि और समुद्र। परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम लड़ाकू विमान, भूमि आधारित बैलिस्टिक मिसाइलें तथा समुद्र आधारित प्लेटफॉर्म इसकी मुख्य ताकत हैं। वर्ष 2025 के दौरान भारत ने लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियों के विकास पर कार्य जारी रखा, जिनका रणनीतिक महत्व विशेष रूप से एशियाई क्षेत्र में देखा जाता है। इसके साथ ही मोबाइल लॉन्चर, छिपाव तकनीक और समुद्री तैनाती के माध्यम से प्रतिरोधक क्षमता को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाने का प्रयास किया गया है।
एमआईआरवी और आधुनिक मिसाइल तकनीक
भारत बहु-स्वतंत्र लक्ष्यीय पुनःप्रवेश वाहन यानी एमआईआरवी तकनीक पर भी काम कर रहा है। इस तकनीक की मदद से एक ही बैलिस्टिक मिसाइल कई अलग-अलग वारहेड ले जा सकती है और विभिन्न लक्ष्यों पर प्रहार कर सकती है। इसके अतिरिक्त भारत कैनिस्टरयुक्त मिसाइल प्रणालियों की ओर भी बढ़ रहा है। ऐसी मिसाइलें सीलबंद कंटेनरों में सुरक्षित रखी जाती हैं, जिससे उनकी सुरक्षा बढ़ती है और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें तेजी से प्रक्षेपित किया जा सकता है।
समुद्री प्रतिरोधक क्षमता और एसएसबीएन
भारत की परमाणु त्रिस्तरीय शक्ति का तीसरा और महत्वपूर्ण स्तंभ समुद्री प्रतिरोधक क्षमता है। इसके अंतर्गत परमाणु ऊर्जा से संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी यानी एसएसबीएन शामिल है। ऐसी पनडुब्बियां परमाणु वारहेड युक्त बैलिस्टिक मिसाइलों को ले जाने में सक्षम होती हैं। सिपरी के आकलन के अनुसार जनवरी 2026 तक भारत ने सीमित संख्या में परमाणु वारहेड के साथ एक एसएसबीएन को प्रतिरोधक गश्त के लिए तैनात करना शुरू किया हो सकता है। समुद्र आधारित प्रतिरोधक क्षमता किसी भी देश की परमाणु सुरक्षा व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बनाती है।
भारत-पाकिस्तान परमाणु परिदृश्य
दक्षिण एशिया में भारत की परमाणु रणनीति पर पाकिस्तान के साथ उसकी प्रतिद्वंद्विता का महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है। दोनों देशों ने 1990 के दशक के अंत से परमाणु हथियारों और बैलिस्टिक मिसाइल प्रणालियों का विकास किया है। वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच सीमित सैन्य संघर्ष की स्थिति बनी, लेकिन दोनों पक्षों ने परमाणु स्तर तक तनाव बढ़ने से रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए। इसलिए भारत-पाकिस्तान परमाणु संतुलन आज भी क्षेत्रीय सुरक्षा अध्ययन का प्रमुख विषय बना हुआ है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- सिपरी (SIPRI) का पूरा नाम स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट है और इसका मुख्यालय स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में स्थित है।
- भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण ‘पोखरण-1’ वर्ष 1974 में किया था।
- वर्ष 1998 में पोखरण-2 परीक्षणों के बाद भारत ने स्वयं को परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र घोषित किया।
- परमाणु त्रयी (न्यूक्लियर ट्रायड) में भूमि, वायु और समुद्र आधारित परमाणु प्रक्षेपण प्रणालियां शामिल होती हैं।
भारत की परमाणु नीति का उद्देश्य आक्रामक विस्तार नहीं बल्कि विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखना है। आधुनिक मिसाइल तकनीक, समुद्री प्रतिरोधक शक्ति और त्रिस्तरीय परमाणु संरचना भारत की सामरिक सुरक्षा को मजबूत बनाती हैं। बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में भारत की परमाणु क्षमता उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है।