जोरावर लाइट टैंक और तेजास्त्र: भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता को नई मजबूती
भारत ने जून 2026 में गुजरात के हजीरा स्थित लार्सन एंड टुब्रो संयंत्र में स्वदेशी रूप से विकसित जोरावर लाइट टैंक और तेजास्त्र कार्यक्रम का प्रदर्शन किया। ये दोनों परियोजनाएं देश की आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता को मजबूत करने और आधुनिक युद्धक्षेत्र की चुनौतियों का सामना करने के लिए विकसित की जा रही हैं। विशेष रूप से उच्च हिमालयी क्षेत्रों और भविष्य की उन्नत युद्ध तकनीकों को ध्यान में रखते हुए इन प्रणालियों का विकास किया गया है।
जोरावर लाइट टैंक: ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए विशेष डिजाइन
Zorawar Light Tank एक 25 टन वजनी स्वदेशी हल्का टैंक है, जिसे Defence Research and Development Organisation और Larsen & Toubro के संयुक्त सहयोग से विकसित किया गया है। इस टैंक को विशेष रूप से पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में संचालन के लिए डिजाइन किया गया है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के निकट ऐसे क्षेत्रों में जहां भारी मुख्य युद्धक टैंकों की गतिशीलता सीमित होती है, वहां जोरावर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसकी उच्च गतिशीलता, कम वजन और कठिन भूभाग में संचालन क्षमता इसे भारतीय सेना के लिए एक रणनीतिक संपत्ति बनाती है।
नाग एमके-II मिसाइल का एकीकरण
जोरावर टैंक में Nag Mk II एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल को एकीकृत किया गया है। इस मिसाइल की मारक क्षमता 7 से 10 किलोमीटर तक है और यह आधुनिक बख्तरबंद लक्ष्यों को नष्ट करने में सक्षम है। टैंक ने अक्टूबर 2025 में सफल परीक्षण पूरे किए थे, जिसके बाद इसके उत्पादन और तैनाती की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।
खरीद और तैनाती योजना
रक्षा मंत्रालय ने जोरावर टैंक के लिए प्रारंभिक रूप से 59 इकाइयों का आदेश दिया है। इसके अतिरिक्त दीर्घकालिक योजना के तहत 295 से अधिक अतिरिक्त टैंकों की खरीद का प्रस्ताव है। पूरे कार्यक्रम के तहत इन टैंकों की पूर्ण तैनाती वर्ष 2027 तक किए जाने का लक्ष्य रखा गया है। यह परियोजना भारत की उच्च-ऊंचाई युद्धक क्षमता को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
तेजास्त्र: निर्देशित ऊर्जा हथियारों की दिशा में कदम
TEJASTRA भारत की निर्देशित ऊर्जा हथियार और लेजर आधारित रक्षा प्रणालियों की विकास योजना है। निर्देशित ऊर्जा हथियार केंद्रित ऊर्जा, विशेष रूप से लेजर किरणों का उपयोग करके लक्ष्यों को निष्क्रिय या नष्ट करते हैं। इन्हें भविष्य के युद्धक्षेत्र की महत्वपूर्ण तकनीक माना जाता है क्योंकि इनमें अत्यधिक सटीकता और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता होती है।
चरणबद्ध विकास योजना
तेजास्त्र के पहले चरण में 10 से 20 किलोवाट क्षमता वाले लेजर आधारित सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं। इनका उपयोग ड्रोन-रोधी अभियानों और कम दूरी की वायु रक्षा में किया जाएगा। दूसरे चरण की योजना वर्ष 2028 के लिए निर्धारित है, जिसमें 50 से 100 किलोवाट क्षमता वाले सामरिक लेजर सिस्टम विकसित किए जाएंगे। इसके अतिरिक्त डीआरडीओ 50 किलोवाट क्षमता वाले एक उन्नत लेजर हथियार कार्यक्रम पर भी कार्य कर रहा है। इसके परीक्षण 2027 में होने की संभावना है और वर्ष 2030 तक इसके सैन्य उपयोग में शामिल होने का लक्ष्य रखा गया है।
आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण की दिशा में प्रगति
जोरावर और तेजास्त्र दोनों परियोजनाएं भारत के स्वदेशी रक्षा निर्माण अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन कार्यक्रमों में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, रक्षा मंत्रालय और निजी क्षेत्र की कंपनियों की संयुक्त भागीदारी देखने को मिलती है। इस प्रकार की साझेदारी न केवल उन्नत रक्षा तकनीकों के विकास को बढ़ावा देती है, बल्कि देश को आयात पर निर्भरता कम करने और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने में भी सहायता प्रदान करती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- जोरावर एक 25 टन वजनी स्वदेशी हल्का टैंक है।
- नाग एमके-II एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल की मारक क्षमता 7 से 10 किलोमीटर है।
- निर्देशित ऊर्जा हथियारों में लेजर आधारित प्रणालियां शामिल होती हैं।
- गुजरात का हजीरा क्षेत्र लार्सन एंड टुब्रो की प्रमुख औद्योगिक सुविधाओं में से एक है।
जोरावर लाइट टैंक और तेजास्त्र कार्यक्रम भारत की रक्षा तकनीक में हो रही प्रगति के प्रतीक हैं। ये परियोजनाएं भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के साथ-साथ देश की स्वदेशी सैन्य क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।