भारतीय नौसेना को मिला आईएनएस अग्रय, स्वदेशी पनडुब्बी रोधी क्षमता को मिलेगा बल
भारतीय नौसेना के लिए निर्मित आईएनएस अग्रय (INS Agray) अर्नाला श्रेणी के एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट (ASW SWC) का पांचवां युद्धपोत है। इस पोत को 13 मार्च 2024 को लॉन्च किया गया था और 30 मार्च 2026 को कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) द्वारा भारतीय नौसेना को सौंप दिया गया। यह युद्धपोत तटीय क्षेत्रों और उथले जल क्षेत्रों में पनडुब्बी रोधी अभियानों को मजबूत बनाने के लिए विकसित किया गया है।
अर्नाला श्रेणी की परियोजना
भारतीय नौसेना ने 29 अप्रैल 2019 को लगभग 6,311.32 करोड़ रुपये की लागत से आठ एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट के निर्माण का अनुबंध किया था। इन युद्धपोतों का उद्देश्य उथले समुद्री क्षेत्रों में पनडुब्बियों की पहचान, निगरानी और उनसे निपटने की क्षमता को बढ़ाना है। इसके अलावा ये पोत तटीय निगरानी, समुद्री सुरक्षा तथा बारूदी सुरंगों (माइंस) की पहचान और निष्क्रियकरण जैसे कार्यों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा
आईएनएस अग्रय में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री और तकनीक का उपयोग किया गया है। यह भारत की रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। स्वदेशी तकनीकों के उपयोग से न केवल रक्षा क्षमता मजबूत होती है, बल्कि घरेलू रक्षा उद्योग को भी प्रोत्साहन मिलता है।
आधुनिक हथियार और सेंसर प्रणाली
आईएनएस अग्रय को अत्याधुनिक पनडुब्बी रोधी उपकरणों और हथियार प्रणालियों से लैस किया गया है। इसमें हुल-माउंटेड सोनार और वैरिएबल डेप्थ सोनार लगाए गए हैं, जो समुद्र के भीतर पनडुब्बियों का पता लगाने में सहायता करते हैं। इसके अतिरिक्त युद्धपोत में एंटी-सबमरीन टॉरपीडो और रॉकेट भी लगाए गए हैं, जिनका उपयोग दुश्मन पनडुब्बियों के खिलाफ किया जा सकता है।
वाटरजेट प्रणोदन प्रणाली की विशेषता
आईएनएस अग्रय की एक प्रमुख विशेषता इसकी वाटरजेट प्रणोदन प्रणाली है। वाटरजेट तकनीक युद्धपोत को बेहतर गतिशीलता प्रदान करती है और समुद्र के भीतर कम ध्वनि उत्पन्न करती है। कम शोर होने के कारण दुश्मन पनडुब्बियों के लिए जहाज का पता लगाना अधिक कठिन हो जाता है। यही कारण है कि आधुनिक पनडुब्बी रोधी युद्धपोतों में इस तकनीक का महत्व बढ़ता जा रहा है।
आकार और क्षमता
आईएनएस अग्रय की लंबाई लगभग 77 मीटर है और इसका विस्थापन (Displacement) लगभग 900 टन है। यह भारतीय नौसेना के उन बड़े युद्धपोतों में शामिल है जिन्हें वाटरजेट प्रणोदन प्रणाली से संचालित किया जाता है। इसका आकार और तकनीकी क्षमता इसे तटीय सुरक्षा अभियानों के लिए उपयुक्त बनाती है।
नौसेना में भूमिका
भारतीय नौसेना के लिए उथले जल क्षेत्रों में पनडुब्बी गतिविधियों की निगरानी अत्यंत महत्वपूर्ण है। आईएनएस अग्रय जैसे युद्धपोत समुद्री सीमाओं की सुरक्षा, तटीय क्षेत्रों की निगरानी और समुद्री खतरों से निपटने में महत्वपूर्ण योगदान देंगे। यह पोत भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
प्रतीक चिह्न और कमीशनिंग
आईएनएस अग्रय का आधिकारिक प्रतीक चिह्न (Crest) 10 जून 2026 को अनावरण किया गया। नौसेना की योजना के अनुसार आईएनएस अग्रय के साथ आईएनएस दुनागिरी और आईएनएस संशोधक को भी भारतीय नौसेना में शामिल किया जाना है, जिससे समुद्री सुरक्षा क्षमताओं में और वृद्धि होगी।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- आईएनएस अग्रय अर्नाला श्रेणी के एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट का पांचवां पोत है।
- इसे 13 मार्च 2024 को लॉन्च किया गया और 30 मार्च 2026 को नौसेना को सौंपा गया।
- अर्नाला श्रेणी के आठ युद्धपोतों के निर्माण का अनुबंध 29 अप्रैल 2019 को किया गया था।
- एएसडब्ल्यू एसडब्ल्यूसी का पूर्ण रूप एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट है।
- जीआरएसई (GRSE) का मुख्यालय कोलकाता में स्थित है।
- आईएनएस अग्रय में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है।
- हुल-माउंटेड सोनार और वैरिएबल डेप्थ सोनार पनडुब्बी पहचान के लिए उपयोग किए जाते हैं।
- वाटरजेट प्रणोदन प्रणाली उच्च गतिशीलता और कम जलमग्न शोर प्रदान करती है।
आईएनएस अग्रय का भारतीय नौसेना में शामिल होना देश की समुद्री सुरक्षा और पनडुब्बी रोधी क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अत्याधुनिक तकनीक, उच्च स्वदेशीकरण और आधुनिक हथियार प्रणालियों से लैस यह युद्धपोत भारत की तटीय सुरक्षा और समुद्री रणनीति को नई मजबूती प्रदान करेगा।