बीएचयू को आईसीएमआर से 6 बड़े शोध अनुदान, चिकित्सा अनुसंधान को नई रफ्तार

बीएचयू को आईसीएमआर से 6 बड़े शोध अनुदान, चिकित्सा अनुसंधान को नई रफ्तार

वाराणसी स्थित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) को भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की योजना के तहत छह प्रमुख बायोमेडिकल शोध अनुदान मिले हैं। इन परियोजनाओं के लिए लगभग 15 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई है। इन शोधों का दायरा गॉलब्लैडर कैंसर, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस, पोस्ट-काला-आजार डर्मल लीशमैनियासिस, बाल्यावस्था सेप्टिक शॉक और रीनल सेल कार्सिनोमा के लिए प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी तक फैला है।

बीएचयू के शोध ढांचे को मिली बड़ी मजबूती

बीएचयू देश के प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से एक है, जिसकी स्थापना 1916 में हुई थी। विश्वविद्यालय में चिकित्सा अनुसंधान का मुख्य केंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (आईएमएस) है, जो क्लिनिकल रिसर्च, मेडिकल शिक्षा और रोग-आधारित अध्ययन के लिए जाना जाता है। इन नए अनुदानों से संस्थान के शोध ढांचे को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

बीएचयू की ओर से हाल के महीनों में बड़ी संख्या में परियोजना प्रस्ताव विभिन्न फंडिंग एजेंसियों को भेजे गए थे। छह महीनों में 200 से अधिक प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए, जिनमें से छह को आईसीएमआर से स्वीकृति मिली। यह विश्वविद्यालय में शोध प्रतिस्पर्धा और वैज्ञानिक क्षमता दोनों का संकेत देता है।

किन बीमारियों पर होगा फोकस

इन परियोजनाओं का उद्देश्य केवल रोगों का अध्ययन करना नहीं, बल्कि उनके शुरुआती निदान, बेहतर उपचार और सटीक चिकित्सा पद्धतियों की दिशा में काम करना है। गॉलब्लैडर कैंसर के शुरुआती पता लगाने पर शोध, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के खिलाफ नई रणनीतियाँ, और पोस्ट-काला-आजार डर्मल लीशमैनियासिस के लिए बेहतर डायग्नोस्टिक्स इस सूची में शामिल हैं।

इसके अलावा, बाल्यावस्था सेप्टिक शॉक पर क्लिनिकल रिसर्च और रीनल सेल कार्सिनोमा के लिए प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी भी इस पोर्टफोलियो का हिस्सा है। रीनल सेल कार्सिनोमा किडनी कैंसर का एक प्रकार है, जो किडनी की नलिकाओं से उत्पन्न होता है। इन अध्ययनों में कोहोर्ट स्टडी, प्रिसिजन क्लिनिकल ट्रायल, मल्टी-ओमिक्स बायोमार्कर खोज और प्रयोगशाला विश्लेषण जैसी आधुनिक विधियों का उपयोग होगा।

आईसीएमआर और अंतरविषयी सहयोग का महत्व

आईसीएमआर भारत की शीर्ष बायोमेडिकल अनुसंधान संस्था है और यह स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत काम करती है। 1911 में स्थापित यह संस्था रोग निगरानी, डायग्नोस्टिक्स, उपचार और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े शोध को प्रतिस्पर्धी अनुदानों के माध्यम से समर्थन देती है।

बीएचयू में इन परियोजनाओं में आईएमएस के साथ विज्ञान संस्थान और इंजीनियरिंग विभागों की भी भागीदारी होगी। चिकित्सा, जीवविज्ञान और इंजीनियरिंग का यह संयोजन आधुनिक बायोमेडिकल नवाचार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि निदान, डेटा विश्लेषण और उपकरण विकास में अलग-अलग क्षेत्रों की विशेषज्ञता की जरूरत होती है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना 1916 में हुई थी और यह उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित है।
  • आईसीएमआर की स्थापना 1911 में हुई थी और यह दुनिया के सबसे पुराने चिकित्सा अनुसंधान निकायों में गिना जाता है।
  • एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस का अर्थ है सूक्ष्मजीवों का उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाना, जो पहले उन्हें रोकती या नष्ट करती थीं।
  • पोस्ट-काला-आजार डर्मल लीशमैनियासिस, विसरल लीशमैनियासिस से जुड़ी एक त्वचा-समस्या है, जो लीशमैनिया परजीवी से संबंधित होती है।

इन अनुदानों से बीएचयू में रोग-आधारित शोध, क्लिनिकल नवाचार और अंतरविषयी सहयोग को नई दिशा मिलने की संभावना है। यह उपलब्धि विश्वविद्यालय की चिकित्सा अनुसंधान क्षमता को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक सशक्त बनाती है।

Originally written on August 20, 2026 and last modified on August 20, 2026.

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