पुणे के वैज्ञानिकों ने खोजे पांच नए मिलीसेकंड पल्सर
भारत के राष्ट्रीय रेडियो खगोल भौतिकी केंद्र (एनसीआरए), पुणे के खगोलविदों ने 10 जून 2026 को एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल करते हुए पांच नए मिलीसेकंड पल्सरों की खोज की है। यह खोज भारत के उन्नत जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप (यूजीएमआरटी) की सहायता से की गई। इन पल्सरों का पता मिल्की वे आकाशगंगा के सबसे पुराने और अत्यधिक सघन तारकीय समूहों में शामिल मेसियर 69 और मेसियर 70 ग्लोबुलर क्लस्टरों में लगाया गया। यह खोज न्यूट्रॉन तारों और तारकीय विकास के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली मानी जा रही है।
मिलीसेकंड पल्सर क्या होते हैं?
मिलीसेकंड पल्सर अत्यंत तेज गति से घूमने वाले न्यूट्रॉन तारे होते हैं। इनका घूर्णन काल केवल कुछ मिलीसेकंड का होता है, अर्थात वे एक सेकंड में सैकड़ों बार घूम सकते हैं। इनका निर्माण सामान्यतः द्वितारा प्रणाली (बाइनरी सिस्टम) में होता है। जब किसी साथी तारे से पदार्थ न्यूट्रॉन तारे पर गिरता है, तो उसके साथ कोणीय संवेग भी स्थानांतरित होता है। इससे न्यूट्रॉन तारे की घूर्णन गति लगातार बढ़ती जाती है और वह एक मिलीसेकंड पल्सर में परिवर्तित हो सकता है। ये खगोलीय पिंड ब्रह्मांड के सबसे सटीक प्राकृतिक समयमापकों में गिने जाते हैं।
ग्लोबुलर क्लस्टर और उनकी विशेषताएं
ग्लोबुलर क्लस्टर गुरुत्वाकर्षण द्वारा बंधे हुए तारों के गोलाकार समूह होते हैं। इनमें लाखों तारे अत्यंत सघन रूप से एकत्रित रहते हैं। ये तारे सामान्यतः बहुत पुराने होते हैं और आकाशगंगाओं के बाहरी प्रभामंडल (हेलो) क्षेत्र में पाए जाते हैं। मेसियर 69 और मेसियर 70 ऐसे ही दो प्रसिद्ध ग्लोबुलर क्लस्टर हैं, जो धनु (सैजिटेरियस) तारामंडल में स्थित हैं। इन समूहों का अध्ययन खगोलविदों को आकाशगंगा के प्रारंभिक इतिहास और तारकीय विकास को समझने में सहायता करता है।
खोज की प्रमुख विशेषताएं
नई खोज में दो मिलीसेकंड पल्सर मेसियर 69 में और तीन मेसियर 70 में पाए गए हैं। विशेष रूप से एम69ए नामक पल्सर ने वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया है। यह एक साथी तारे के साथ निकट कक्षा में स्थित है, जो संभवतः एक श्वेत बौना (व्हाइट ड्वार्फ) है। एम69ए कुछ ही दिनों में अपने साथी तारे की एक परिक्रमा पूरी कर लेता है। ऐसे कॉम्पैक्ट बाइनरी सिस्टम वैज्ञानिकों को न्यूट्रॉन तारों के विकास और तारकीय अंतःक्रियाओं को समझने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं।
वैज्ञानिक महत्व
मेसियर 69 और मेसियर 70 में पल्सरों की यह पहली खोज है। इससे ग्लोबुलर क्लस्टरों में ज्ञात पल्सरों की संख्या बढ़ी है और खगोलविदों को न्यूट्रॉन तारों, कॉम्पैक्ट बाइनरी प्रणालियों तथा तारकीय विकास से संबंधित नई जानकारी प्राप्त होगी। मिलीसेकंड पल्सरों का उपयोग गुरुत्वाकर्षण तरंगों के अध्ययन, सापेक्षता सिद्धांत के परीक्षण तथा ब्रह्मांडीय समय मापन जैसे कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अनुसंधानों में किया जाता है। इसलिए यह खोज भविष्य के खगोलीय अध्ययनों के लिए अत्यंत मूल्यवान मानी जा रही है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप (जीएमआरटी) महाराष्ट्र के पुणे के निकट स्थित है।
- उन्नत जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप को संक्षेप में यूजीएमआरटी (uGMRT) कहा जाता है।
- मेसियर 69 और मेसियर 70 प्रसिद्ध मेसियर कैटलॉग में सूचीबद्ध गहरे आकाशीय पिंड हैं।
- मिलीसेकंड पल्सर न्यूट्रॉन तारों का एक विशेष वर्ग हैं, जिनका उपयोग तारकीय विकास और घनी तारकीय प्रणालियों के अध्ययन में किया जाता है।
पुणे के वैज्ञानिकों द्वारा की गई यह खोज भारतीय खगोल विज्ञान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे न केवल ब्रह्मांड में मौजूद रहस्यमय न्यूट्रॉन तारों के बारे में नई जानकारी मिलेगी, बल्कि वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय को भी तारकीय विकास और कॉम्पैक्ट खगोलीय प्रणालियों को समझने में महत्वपूर्ण सहायता प्राप्त होगी।