पिचावरम मैंग्रोव वन का आर्थिक मूल्य ₹2,485 करोड़ आंका गया, ब्लू कार्बन संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका

पिचावरम मैंग्रोव वन का आर्थिक मूल्य ₹2,485 करोड़ आंका गया, ब्लू कार्बन संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका

तमिलनाडु के कडलूर जिले स्थित पिचावरम मैंग्रोव वन का कुल पारिस्थितिकी तंत्र मूल्य ₹2,485.38 करोड़ (लगभग 289 मिलियन अमेरिकी डॉलर) आंका गया है। अध्ययन के अनुसार, इस मैंग्रोव क्षेत्र का प्रति हेक्टेयर आर्थिक मूल्य लगभग ₹1.83 करोड़ है। इस मूल्यांकन में कार्बन भंडारण, मत्स्य संसाधनों का संरक्षण, पर्यटन, तटीय सुरक्षा, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों की आजीविका जैसे विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को शामिल किया गया है। यह अध्ययन मैंग्रोव वनों के पर्यावरणीय और आर्थिक महत्व को रेखांकित करता है।

पिचावरम मैंग्रोव और रामसर स्थल का महत्व

पिचावरम भारत के सबसे बड़े मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक है और इसे रामसर स्थल का दर्जा प्राप्त है। मैंग्रोव ऐसे लवण-सहिष्णु (हेलोफाइटिक) तटीय वन होते हैं, जो ज्वारीय क्षेत्रों, खारे पानी और दलदली मिट्टी में विकसित होते हैं। ये वन समुद्री तूफानों और तटीय कटाव से सुरक्षा प्रदान करने के साथ-साथ अनेक जलीय जीवों के लिए प्राकृतिक आवास का कार्य करते हैं। भारत में मैंग्रोव मुख्य रूप से गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के तटीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। रामसर अभिसमय, 1971 के अंतर्गत मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र को अंतरराष्ट्रीय महत्व के तटीय आर्द्रभूमि के रूप में मान्यता प्राप्त है।

ब्लू कार्बन का विशाल भंडार

अध्ययन के अनुसार पिचावरम मैंग्रोव में औसतन 79.449 टन प्रति हेक्टेयर वनस्पति कार्बन संग्रहित है, जिसका आर्थिक मूल्य लगभग ₹28 लाख प्रति हेक्टेयर आंका गया है। कुल वनस्पति कार्बन का मूल्य ₹387 करोड़ निर्धारित किया गया। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण भंडार मृदा जैविक कार्बन का है, जिसकी औसत मात्रा 251.14 टन प्रति हेक्टेयर पाई गई। इसका मूल्य लगभग ₹90.24 लाख प्रति हेक्टेयर तथा कुल मूल्य ₹1,224.63 करोड़ आंका गया है। वनस्पति और मृदा दोनों को मिलाकर पिचावरम का कुल ब्लू कार्बन मूल्य ₹1,612 करोड़ है, जो लगभग ₹1.19 करोड़ प्रति हेक्टेयर के बराबर है। ब्लू कार्बन उस कार्बन को कहा जाता है, जिसे मैंग्रोव, समुद्री घास (सीग्रास) और लवणीय दलदलों जैसे तटीय एवं समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र अपने भीतर अवशोषित और लंबे समय तक सुरक्षित रखते हैं। यह जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आजीविका और संरक्षण प्रयास

पिचावरम मैंग्रोव क्षेत्र में स्थानीय इरुला जनजाति की आजीविका को मजबूत करने के लिए नाबार्ड द्वारा वित्तपोषित संरक्षण आधारित परियोजना संचालित की जा रही है। लगभग ₹25.37 लाख की इस परियोजना के अंतर्गत 100 इरुला परिवारों को वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन से जोड़ा जा रहा है तथा 250 मधुमक्खी बक्से स्थापित किए जाएंगे। इस परियोजना के तहत उत्पादित शहद को ‘पिचावरम मैंग्रोव हनी’ नाम से बाजार में उपलब्ध कराया जाएगा। इससे स्थानीय समुदाय की आय बढ़ाने के साथ-साथ मैंग्रोव संरक्षण को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

पर्यावरणीय चुनौतियां

पिचावरम मैंग्रोव वर्तमान में कई पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण, झींगा पालन का विस्तार, भूमि उपयोग में परिवर्तन तथा अनियंत्रित पर्यटन इस पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ा रहे हैं। एक वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया कि इस क्षेत्र की मछलियों और शेलफिश में मौसमी माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण मौजूद है, जिसकी मात्रा मानसून के दौरान सबसे अधिक दर्ज की गई।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • पिचावरम तमिलनाडु के कडलूर जिले में स्थित भारत के सबसे बड़े मैंग्रोव वनों में से एक है और इसे रामसर स्थल का दर्जा प्राप्त है।
  • मैंग्रोव लवण-सहिष्णु पौधे होते हैं, जो खारे तटीय और मुहाना क्षेत्रों में विकसित होते हैं।
  • ब्लू कार्बन पारिस्थितिकी तंत्र में मैंग्रोव, समुद्री घास (सीग्रास) और लवणीय दलदल शामिल होते हैं।
  • रामसर अभिसमय वर्ष 1971 में अपनाया गया था और इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों का संरक्षण करना है।

पिचावरम मैंग्रोव का आर्थिक मूल्यांकन यह दर्शाता है कि प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे जलवायु परिवर्तन से निपटने, जैव विविधता को सुरक्षित रखने, तटीय क्षेत्रों की रक्षा करने और स्थानीय समुदायों की आजीविका सुदृढ़ करने में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह अध्ययन मैंग्रोव संरक्षण की आवश्यकता और उनके दीर्घकालिक आर्थिक महत्व को स्पष्ट रूप से सामने लाता है।

Originally written on July 15, 2026 and last modified on July 15, 2026.

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