कंक्रीट के जंगलों में पानी की तलाश और सरकार का नया मास्टरप्लान

कंक्रीट के जंगलों में पानी की तलाश और सरकार का नया मास्टरप्लान

गर्मियों के मौसम में भारत के बड़े शहरों की एक आम तस्वीर लगभग हर किसी ने देखी होगी—पानी के टैंकरों के पीछे भागते लोग, सूखते बोरवेल और हर साल गहराता जल संकट। कंक्रीट की सड़कों और गगनचुंबी इमारतों के बीच आसमान से बरसने वाला पानी नालियों से बहकर बर्बाद हो जाता है, जबकि जमीन के नीचे का जलस्तर (ग्राउंडवॉटर) लगातार पाताल में जा रहा है। इसी संकट से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने अपने एक बड़े अभियान का दायरा बढ़ाते हुए ‘कैच द रेन’ (Catch the Rain) पहल को शहरी इलाकों में बड़े पैमाने पर लागू करना शुरू कर दिया है। अमृत 2.0 (AMRUT 2.0) मिशन के तहत आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने देश के 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 900 शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को इस मुहिम से जोड़ा है। इसका मुख्य उद्देश्य बहुत सीधा और साफ है—”पानी जहां भी गिरे और जब भी गिरे, उसे वहीं समेट लिया जाए”। यह महज एक सरकारी योजना नहीं है, बल्कि यह हमारे शहरों को भविष्य में पानी की कमी से बचाने और अचानक आने वाली शहरी बाढ़ से सुरक्षित रखने की एक वैज्ञानिक कोशिश है।

जमीन के नीचे पानी बैंक बनाने की तैयारी

शहरी इलाकों में पानी की बर्बादी रोकने के लिए जल शक्ति अभियान-जन भागीदारी 2.0 के तहत ग्राउंडवॉटर रिचार्ज इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विस्तार किया जा रहा है। देश के 79 बड़े नगर निगमों में लगभग 1.99 लाख ग्राउंडवॉटर रिचार्ज स्ट्रक्चर बनाने का काम हाथ में लिया गया है। इसके अलावा, 738 अन्य शहरी निकायों में 73,000 से ज्यादा ऐसे ढांचे तैयार किए जा रहे हैं जो बारिश के पानी को सीधे जमीन के भीतर भेजने का काम करेंगे। यह पूरा सिस्टम एक तरह से जमीन के नीचे पानी का बैंक बनाने जैसा है। आम तौर पर जब बारिश होती है, तो शहरों की पक्की सतह के कारण पानी जमीन में नहीं रिस पाता। इन नए रिचार्ज स्ट्रक्चर की मदद से बारिश के पानी को इकट्ठा करके सीधे उन परतों तक पहुंचाया जा रहा है, जहां पानी प्राकृतिक रूप से जमा रहता है। इससे न सिर्फ शहरों का वाटर लेवल सुधरेगा, बल्कि आने वाले समय में टैंकरों पर निर्भरता भी कम होगी।

जमीन के नीचे पानी बैंक बनाने की तैयारी

उथले जलभृत प्रबंधन की नई तकनीक

इस अभियान की सबसे बड़ी खासियत इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। इसके तहत ‘शैलो एक्विफर मैनेजमेंट’ (Shallow Aquifer Management – SAM) प्रोग्राम चलाया जा रहा है। सरल शब्दों में कहें तो एक्विफर जमीन के नीचे मौजूद चट्टानों या रेत की वह परत होती है जिसमें पानी जमा रहता है। इस प्रोग्राम के तहत सबसे पहले वैज्ञानिक तरीके से मैपिंग की जाती है कि किस शहर में जमीन के नीचे पानी सोखने की क्षमता कहां पर कैसी है। देश के अलग-अलग हिस्सों में वहां की भौगोलिक स्थिति के हिसाब से अलग-अलग तरीके अपनाए जा रहे हैं:

  • पश्चिम बंगाल का बर्दवान और आंध्र प्रदेश का विजयनगरम: यहां रिचार्ज पिट्स को सीधे ‘इंजेक्‍शन बोरवेल’ से जोड़ा गया है, जिससे बारिश का पानी बिना बर्बाद हुए सीधे गहरी परतों में चला जाता है।
  • अरुणाचल प्रदेश का ईटानगर: पहाड़ी इलाका होने के कारण यहां इमारतों की छतों पर ‘रूफटॉप रेन वॉटर हार्वेस्टिंग’ सिस्टम बनाए गए हैं, जो पानी को स्टोर भी करते हैं और जमीन को रिचार्ज भी करते हैं।
  • छत्तीसगढ़ का कोरबा और तेलंगाना का वारंगल: इन शहरों में मानसून आने से पहले ही रिचार्ज स्ट्रक्चर का काम पूरा कर लिया गया ताकि बारिश की पहली बूंद से ही पानी को सहेजा जा सके।
उथले जलभृत प्रबंधन की नई तकनीक

झीलों का पुनरुद्धार और कंक्रीट के बीच हरियाली

शहरों में सिर्फ कंक्रीट के गड्ढे ही नहीं बनाए जा रहे, बल्कि पुरानी प्राकृतिक झीलों और तालाबों को भी नया जीवन दिया जा रहा है। वॉटर बॉडी कायाकल्प (Water Body Rejuvenation) योजना के तहत देश भर में लगभग 1.21 लाख एकड़ में फैली शहरी झीलों और तालाबों को साफ और गहरा किया जा रहा है। इस काम में केवल तालाबों की खुदाई ही नहीं शामिल है, बल्कि उनके इनलेट (जहां से पानी आता है) और आउटलेट (जहां से पानी निकलता है) को भी सुधारा जा रहा है। किनारों को मजबूत किया जा रहा है और आसपास पेड़-पौधे लगाए जा रहे हैं ताकि जैव विविधता बनी रहे। जब ये तालाब पानी से लबालब होंगे, तो आसपास के इलाकों में ग्राउंडवॉटर अपने आप बढ़ जाएगा और भारी बारिश के दौरान शहरों में बाढ़ जैसी स्थिति भी नहीं बनेगी। इसके साथ ही, शहरों के तापमान को कम करने के लिए 12,750 एकड़ से अधिक क्षेत्र में पार्क और ग्रीन स्पेस विकसित किए जा रहे हैं। ये हरे-भरे क्षेत्र न केवल शहरों को सांस लेने के लिए साफ हवा देंगे, बल्कि कंक्रीट की वजह से बनने वाले ‘अर्बन हीट आइलैंड’ (शहरी इलाकों का अत्यधिक गर्म होना) के असर को भी कम करेंगे।

दिल्ली का सख्त कदम और आम जनता की भागीदारी

केंद्र की इस बड़ी पहल के बीच देश की राजधानी दिल्ली ने भी जल संकट से निपटने के लिए एक कड़ा रुख अपनाया है। दिल्ली सरकार ने ‘कैच द रेन 2026’ अभियान के तहत 100 वर्ग मीटर या उससे बड़े आकार की सभी इमारतों के लिए रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य कर दिया है। सरकार ने इसके लिए ‘नीरा’ नाम का एक वॉटर मैस्कॉट (शुभंकर) भी जारी किया है ताकि लोगों को जागरूक किया जा सके। लोगों को इस मुहिम से जोड़ने के लिए नियमों के साथ-साथ प्रोत्साहन भी दिया जा रहा है:

  • जो मकान मालिक अपनी छत पर पानी सहेजने का सिस्टम लगाएंगे, उन्हें पानी के बिल में 10 प्रतिशत तक की छूट मिल सकती है।
  • सिस्टम लगाने के लिए सरकार की तरफ से 50,000 रुपये तक की वित्तीय सहायता और दिल्ली जल बोर्ड के माध्यम से तकनीकी मदद भी दी जा रही है।
  • सभी सरकारी इमारतों के लिए इस तकनीक को अपनाना अनिवार्य कर दिया गया है और इसकी डिजिटल मॉनिटरिंग भी की जा रही है।

पानी सहेजने के अनोखे और दिलचस्प तरीके

प्राचीन भारत में पानी सहेजने की परंपरा बहुत समृद्ध थी। राजस्थान की ‘बावडियां’ और दक्षिण भारत के ‘एरी’ (तलाब व्यवस्था) इसके बेहतरीन उदाहरण हैं। आज के आधुनिक शहरों में तकनीक की मदद से इसे और आसान बना दिया गया है। मिसाल के तौर पर, घरों की छतों से गिरने वाले पानी को पाइप के जरिए एक छोटे से ‘फिल्टर चैंबर’ में भेजा जाता है, जहां रेत, कंकड़ और चारकोल (कोयला) की परतें पानी की गंदगी को साफ कर देती हैं। इसके बाद इस पानी को सीधे एक टैंक में जमा करके रोजमर्रा के कामों जैसे कपड़े धोने या बागवानी में इस्तेमाल किया जा सकता है। एक और दिलचस्प तकनीक है ‘परकोलेशन पिट’ या सोख्ता गड्ढा। इसमें जमीन में एक गहरा गड्ढा करके उसे पत्थरों और रेत से भर दिया जाता है। जब सड़क या आंगन का पानी इसमें आता है, तो वह धीरे-धीरे छनकर सीधे जमीन के अंदर चला जाता है। बड़े शहरों में अब ऐसी सड़कों और फुटपाथों का परीक्षण भी किया जा रहा है जो पानी को अपने अंदर सोख लेती हैं, जिन्हें ‘पोरस कंक्रीट’ कहा जाता है। आने वाले समय में ये तकनीकें हमारे शहरों की सूरत और सीरत दोनों बदल सकती हैं, क्योंकि आज बचाई गई पानी की हर एक बूंद हमारे भविष्य के लिए सबसे बड़ा निवेश है।

Originally written on July 15, 2026 and last modified on July 15, 2026.

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