मेक इन इंडिया के बीच चीन से रिकॉर्ड 80 अरब डॉलर का आयात, आत्मनिर्भरता की राह में कहां फंसा है पेंच?

मेक इन इंडिया के बीच चीन से रिकॉर्ड 80 अरब डॉलर का आयात, आत्मनिर्भरता की राह में कहां फंसा है पेंच?

भारत और चीन के बीच सीमा पर चल रहे तनाव और देश में ‘बॉयकॉट चाइना’ के नारों के बीच एक ऐसी आर्थिक हकीकत सामने आई है जो सबको चौंका सकती है। साल 2026 की पहली छमाही (जनवरी से जून) में भारत का चीन से आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। आंकड़ों के मुताबिक, इस साल के पहले छह महीनों में भारत ने चीन से लगभग 80 अरब डॉलर (सटीक रूप से 79.41 अरब डॉलर) का सामान खरीदा है। यह पिछले साल की तुलना में 21.8 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी है। एक तरफ जहां भारत सरकार ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी योजनाओं के जरिए घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रही है, वहीं दूसरी तरफ पड़ोसी देश पर हमारी निर्भरता कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर भारतीय बाजार और यहां की फैक्ट्रियां चाहकर भी चीनी सामान का पीछा क्यों नहीं छुड़ा पा रही हैं?

स्मार्टफोन से लेकर दवाओं तक: हम चीन से क्या खरीद रहे हैं?

आम तौर पर जब लोग चीन से आयात की बात करते हैं, तो उनके दिमाग में सस्ते खिलौने, दिवाली की लाइटें या तैयार स्मार्टफोन आते हैं। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। भारत चीन से जो सामान खरीद रहा है, वह सिर्फ उपभोग (कंजम्पशन) के लिए नहीं है, बल्कि हमारी अपनी फैक्ट्रियों को चलाने के लिए कच्चा माल और मशीनरी है। इस साल आई भारी उछाल के पीछे मुख्य रूप से चार बड़े सेक्टर्स हैं:

स्मार्टफोन से लेकर दवाओं तक: हम चीन से क्या खरीद रहे हैं?
इलेक्ट्रॉनिक्स और कंपोनेंट्स

भारत में बनने वाले स्मार्टफोन, लैपटॉप और अन्य गैजेट्स के ज्यादातर अंदरूनी हिस्से (जैसे सर्किट बोर्ड, डिस्प्ले और चिप्स) आज भी चीन से ही आते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक्स और कंपोनेंट्स
इंडस्ट्रियल मशीनरी

भारतीय फैक्ट्रियों में प्रॉडक्शन बढ़ाने के लिए जिन आधुनिक मशीनों की जरूरत होती है, वे बड़े पैमाने पर चीन से आयात की जा रही हैं।

एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API)

भारत को ‘दुनिया की फार्मेसी’ कहा जाता है क्योंकि हम बड़े पैमाने पर दवाओं का निर्यात करते हैं। लेकिन इन दवाओं को बनाने के लिए जो मुख्य कच्चा माल (API) चाहिए, उसके लिए हम 70 प्रतिशत से अधिक चीन पर निर्भर हैं।

रिन्यूएबल एनर्जी (सोलर पैनल)

भारत में ग्रीन एनर्जी और सौर ऊर्जा का विस्तार बहुत तेजी से हो रहा है। इन सौर संयंत्रों में लगने वाले सोलर सेल और पैनल्स का सबसे बड़ा सप्लायर चीन ही है।

व्यापार घाटा: क्यों खाली हो रही है भारत की जेब?

इस बढ़ते आयात का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा (ट्रेड डेफिसिट) लगातार गहराता जा रहा है। व्यापार घाटे का सीधा मतलब है कि हम चीन को बेच कम रहे हैं और वहां से खरीद ज्यादा रहे हैं, जिससे हमारा विदेशी मुद्रा भंडार चीन की ओर जा रहा है। 2026 की पहली छमाही में दोनों देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार 91.72 अरब डॉलर रहा। इसमें भारत ने सिर्फ 12.31 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि लगभग 80 अरब डॉलर का आयात किया।

व्यापार का मोर्चा (H1 2026) राशि (अरब डॉलर में)
भारत का चीन से आयात $79.41
भारत का चीन को निर्यात $12.31
भारत का कुल व्यापार घाटा $67.10

यह व्यापार घाटा इस बात का संकेत है कि भारत चीन को मुख्य रूप से कच्चा माल जैसे खनिज, कपास और रसायन बेचता है, जिनकी कीमत कम होती है। इसके विपरीत, चीन हमें तैयार उत्पाद और तकनीकी उपकरण बेचता है, जो काफी महंगे होते हैं।

आत्मनिर्भर भारत की राह में सबसे बड़ी रुकावटें

सरकार ने देश में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम जैसी कई बेहतरीन नीतियां लागू की हैं। इसके बावजूद चीन पर निर्भरता बने रहने के पीछे कुछ बड़े व्यावहारिक कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है चीन का ‘स्केल ऑफ प्रॉडक्शन’। चीनी कंपनियों के पास बहुत बड़ी फैक्ट्रियां हैं, जहां एक साथ लाखों की तादाद में चीजें बनती हैं। बड़े पैमाने पर उत्पादन होने के कारण उनकी लागत इतनी कम हो जाती है कि भारतीय निर्माताओं के लिए उस कीमत का मुकाबला करना बेहद मुश्किल होता है। इसके अलावा, चीन ने पिछले तीन दशकों में एक बेहद मजबूत और आपस में जुड़ा हुआ सप्लायर नेटवर्क तैयार किया है। अगर किसी भारतीय कंपनी को एक खास तरह का छोटा सा स्क्रू या कनेक्टर चाहिए, तो वह चीन में कुछ ही घंटों में मिल जाता है, जबकि भारत में वैसी ही इकोसिस्टम तैयार होने में अभी समय लगेगा।

क्या चीन से आयात बढ़ना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बुरा है?

पहली नजर में यह आंकड़ा चिंताजनक लग सकता है, लेकिन अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग इसे अलग नजरिए से देखता है। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि आयात की मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि हम क्या आयात कर रहे हैं। यदि भारत चीन से मशीनें और इंटरमीडिएट गुड्स (ऐसा कच्चा माल जिससे आगे कोई सामान बने) खरीद रहा है, तो इसका मतलब है कि भारत के अंदर औद्योगिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। जब भारतीय फैक्ट्रियां ज्यादा काम करेंगी, तभी वे भविष्य में निर्यात करने के काबिल बन पाएंगी। यानी, भारत को वैश्विक स्तर पर एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए फिलहाल चीनी इनपुट्स की जरूरत पड़ रही है।

आगे का रास्ता और कूटनीतिक चुनौतियां

इस आर्थिक निर्भरता के बीच भारत अब चीन के सामने अपने निर्यात को बढ़ाने की मांग कर रहा है। हाल ही में बीजिंग में हुए वर्ल्ड पीस फोरम में भारतीय राजनयिकों ने इस बात पर जोर दिया कि चीन को भारतीय फार्मास्युटिकल (दवाओं) और आईटी सेक्टर्स के लिए अपने दरवाजे खोलने चाहिए, जहां भारत दुनिया भर में बेहद प्रतिस्पर्धी है। लॉन्ग टर्म में भारत को अपनी निर्भरता कम करने के लिए वियतनाम, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ अपनी सप्लाई चेन को और मजबूत करना होगा। साथ ही घरेलू स्तर पर कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग (पुर्जे बनाने वाले उद्योग) को और ज्यादा रियायतें देनी होंगी, ताकि भविष्य में ‘मेक इन इंडिया’ पूरी तरह से भारतीय संसाधनों पर आधारित हो सके।

Originally written on July 14, 2026 and last modified on July 14, 2026.

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