पश्चिमी घाट में Allographa की नई प्रजातियाँ, जैव विविधता शोध को नई दिशा
पश्चिमी घाट से लाइकेन-निर्माण करने वाले कवकों के एक महत्वपूर्ण समूह Allographa की पाँच नई प्रजातियाँ सामने आई हैं। यह खोज भारत की जैव विविधता के लिहाज से इसलिए अहम मानी जा रही है, क्योंकि पश्चिमी घाट पहले से ही दुनिया के सबसे समृद्ध जैव-विविधता क्षेत्रों में गिना जाता है। इस अध्ययन को पुणे स्थित MACS अघारकर रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने अंजाम दिया, जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन एक स्वायत्त संस्थान है।लाइकेन ऐसे संयुक्त जीव होते हैं, जिनमें एक कवकीय भाग और एक प्रकाश संश्लेषी भाग, आमतौर पर शैवाल या सायनोबैक्टीरिया, साथ मिलकर रहते हैं। इसी कारण इनका अध्ययन न केवल वर्गिकी में, बल्कि पारिस्थितिकी और जैव विविधता अनुसंधान में भी बेहद उपयोगी माना जाता है।
कौन-सी नई प्रजातियाँ मिलीं
शोध में जिन पाँच नई प्रजातियों का वर्णन किया गया है, वे हैं Allographa keralensis, Allographa nayakae, Allographa paraconsanguinea, Allographa persistinspersa और Allographa semicarbonisata। इनमें Allographa keralensis का नाम केरल राज्य से जुड़ा है, जबकि Allographa nayakae भारतीय लाइकेन विशेषज्ञ डॉ. संजीव नायक के सम्मान में रखा गया है।इस तरह की नामकरण परंपरा वैज्ञानिक खोजों को स्थानीय पहचान और शोध-परंपरा दोनों से जोड़ती है। साथ ही, यह बताती है कि भारत के वन क्षेत्रों में अब भी कई सूक्ष्म जीव-जंतु और कवक प्रजातियाँ दर्ज किए जाने की प्रतीक्षा में हैं।
पहचान कैसे की गई
इन प्रजातियों की पहचान केवल बाहरी बनावट के आधार पर नहीं, बल्कि पारंपरिक वर्गिकी और आधुनिक आणविक तकनीकों के संयोजन से की गई। अध्ययन में multi-locus DNA sequencing का उपयोग हुआ, जिसमें तीन आनुवंशिक चिह्नकों—mtSSU, nrLSU और RPB2—का विश्लेषण किया गया।इस पद्धति से वैज्ञानिकों को प्रजातियों की विविधता और उनके विकासवादी संबंधों को अधिक सटीकता से समझने में मदद मिली। यही कारण है कि यह शोध पश्चिमी घाट से Allographa समूह पर किया गया पहला व्यापक आणविक-वंशावली अध्ययन माना जा रहा है।
यह खोज क्यों महत्वपूर्ण है
पश्चिमी घाट को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल और एक प्रमुख जैव-विविधता हॉटस्पॉट के रूप में मान्यता प्राप्त है। ऐसे क्षेत्रों में नई प्रजातियों की पहचान यह संकेत देती है कि पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी वैज्ञानिकों के लिए कई अनदेखे पहलू समेटे हुए है।लाइकेन को पर्यावरणीय बदलावों के प्रति संवेदनशील होने के कारण जैव-संकेतक भी माना जाता है। यानी वायु प्रदूषण और आवासीय बदलावों का असर इन पर जल्दी दिखाई देता है। इसलिए इनका अध्ययन पर्यावरणीय निगरानी और संरक्षण नीति दोनों के लिए उपयोगी है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- पश्चिमी घाट भारत का एक प्रमुख जैव-विविधता हॉटस्पॉट और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।
- लाइकेन कवक और शैवाल/सायनोबैक्टीरिया के सहजीवी संबंध से बनते हैं।
- Multi-locus DNA sequencing में एक से अधिक आनुवंशिक चिह्नकों का उपयोग प्रजाति पहचान के लिए किया जाता है।
- Mycological Progress फफूंद और फंगल टैक्सोनॉमी पर शोध प्रकाशित करने वाली पत्रिका है।
इस खोज से भारत में फंगल विविधता पर उपलब्ध वैज्ञानिक संदर्भ और मजबूत हुए हैं। साथ ही, यह संकेत भी मिलता है कि पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील और समृद्ध पारिस्थितिक क्षेत्रों में सूक्ष्म जीवों की दुनिया अभी भी कई नई जानकारियाँ समेटे हुए है।