न्यायिक ढांचे के आधुनिकीकरण की पहल
भारत में न्यायिक व्यवस्था को अधिक सक्षम, आधुनिक और नागरिक-केंद्रित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायिक अवसंरचना सलाहकार समिति का गठन किया है, जिसका उद्देश्य देशभर की अदालतों की बुनियादी जरूरतों का आकलन कर एक व्यापक रोडमैप तैयार करना है।
समिति की संरचना
इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरविंद कुमार कर रहे हैं। इसमें कलकत्ता हाईकोर्ट, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीशों को भी शामिल किया गया है। इसके अलावा केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के महानिदेशक और सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल भी समिति के सदस्य हैं। सेक्रेटरी जनरल सदस्य सचिव की भूमिका निभाएंगे।
अदालतों की सुविधाओं पर जोर
समिति अदालतों में मौजूद ढांचागत कमियों की पहचान करेगी। इसमें न्यायाधीशों, वकीलों, वादकारियों और अदालत कर्मचारियों के लिए बेहतर सुविधाएं शामिल हैं। कोर्ट भवनों, रिकॉर्ड रूम, डिजिटल फाइलिंग, बैठने की व्यवस्था, आवासीय सुविधाओं और तकनीकी संसाधनों जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
डिजिटल न्याय और नागरिक सेवाएं
समिति का एक बड़ा उद्देश्य अदालतों के कम्प्यूटरीकरण को आगे बढ़ाना है। ई-कोर्ट परियोजनाओं के जरिए न्याय तक पहुंच आसान बनाने, डिजिटल खाई कम करने और नागरिक-केंद्रित सेवाएं विकसित करने पर जोर दिया जाएगा। इससे ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों के लोगों को भी न्यायिक सेवाओं तक बेहतर पहुंच मिल सकती है।
वित्तीय योजना और समयसीमा
समिति न्यायिक अवसंरचना के लिए लगभग 40,000 करोड़ से 50,000 करोड़ रुपये तक के सरकारी आवंटन की सिफारिश कर सकती है। इसका अंतरिम प्रतिवेदन 31 अगस्त 2026 तक मुख्य न्यायाधीश को सौंपे जाने की संभावना है, जिसके बाद इसे केंद्र और राज्य सरकारों के समक्ष रखा जाएगा।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारत का सर्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत स्थापित शीर्ष न्यायिक संस्था है।
- केंद्रीय लोक निर्माण विभाग आवास और शहरी कार्य मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है।
- न्यायिक अवसंरचना में कोर्ट भवन, डिजिटल सिस्टम, रिकॉर्ड रूम और वादकारियों की सुविधाएं शामिल होती हैं।
- अदालतों का कम्प्यूटरीकरण भारत की ई-कोर्ट परियोजना से जुड़ा हुआ है।
यह पहल भारतीय न्याय व्यवस्था को समय के अनुरूप आधुनिक बनाने की दिशा में अहम मानी जा रही है। बेहतर अदालत परिसर, डिजिटल सुविधाएं और पर्याप्त वित्तीय संसाधन न्याय वितरण को तेज, पारदर्शी और अधिक सुलभ बना सकते हैं।