नलसरोवर में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन से संरक्षण और आजीविका को नई दिशा

नलसरोवर में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन से संरक्षण और आजीविका को नई दिशा

गुजरात वन विभाग ने 11 अगस्त 2026 को नलसरोवर पक्षी अभयारण्य के आसपास 2.94 करोड़ रुपये की प्लास्टिक कचरा प्रबंधन परियोजना शुरू की। यह पहल रामसर मान्यता प्राप्त इस आर्द्रभूमि क्षेत्र में प्लास्टिक प्रदूषण घटाने, स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाने और ग्रामीण आजीविका को सहारा देने के उद्देश्य से की गई है।

नलसरोवर जैसे आर्द्रभूमि क्षेत्र के लिए क्यों अहम है यह पहल

नलसरोवर गुजरात का एक महत्वपूर्ण पक्षी अभयारण्य है, जहां बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी आते हैं। ऐसे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र में प्लास्टिक कचरा न केवल जल और भूमि को प्रदूषित करता है, बल्कि पक्षियों और अन्य जीवों के लिए भी खतरा बनता है। इसी चुनौती को देखते हुए यह परियोजना Project for Eco-Restoration in Gujarat से जोड़ी गई है और इसे Japan International Cooperation Agency (JICA) का वित्तीय सहयोग मिला है।

इस परियोजना की खास बात यह है कि यह केवल सफाई अभियान नहीं है, बल्कि कचरे को एक संगठित व्यवस्था के तहत खरीदने और संग्रहित करने की प्रणाली भी बनाती है। इससे ग्रामीणों को प्लास्टिक अलग करने और उसे संग्रह केंद्र तक पहुंचाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।

कैसे चलेगा कचरा संग्रहण तंत्र

इस परियोजना को Nalsarovar Bird Sanctuary, Wildlife Division, Sanand के माध्यम से स्थानीय ग्राम पंचायतों, इको-डेवलपमेंट कमेटियों और समुदाय के सदस्यों के साथ मिलकर लागू किया जा रहा है। अहमदाबाद जिले के विरमगाम तालुका के कायला गांव में एक समर्पित Plastic Waste Collection Centre स्थापित किया गया है।

संग्रह नेटवर्क में अहमदाबाद जिले के वेकरिया, कायला, शाहपुर, धारजी और मेनी तथा सुरेंद्रनगर जिले के नानी कठेची और रणागढ़ गांव शामिल हैं। इको-डेवलपमेंट कमेटियां स्थानीय स्वयंसेवकों को स्वच्छता प्रहरियों के रूप में नियुक्त करेंगी, जो सूखे प्लास्टिक कचरे के पृथक्करण और संग्रह में मदद करेंगे।

परियोजना के तहत संग्रह बिन लगाए गए हैं और कचरे को रोजाना कायला सुविधा केंद्र तक पहुंचाने के लिए केंद्रीकृत परिवहन व्यवस्था बनाई गई है। इसके लिए क्षेत्र में कचरा संग्रह और परिवहन की कार्यप्रणाली पर विस्तृत अध्ययन भी किया गया है, ताकि व्यवस्था व्यावहारिक और नियमित बनी रहे।

संरक्षण, समुदाय और नीति का संयुक्त मॉडल

यह परियोजना दिखाती है कि वन्यजीव संरक्षण केवल सरकारी निगरानी से नहीं, बल्कि स्थानीय समुदाय की भागीदारी से अधिक प्रभावी बनता है। इको-डेवलपमेंट कमेटियां भारत में वन और वन्यजीव प्रबंधन में समुदाय आधारित संस्थाएं होती हैं, जो संरक्षण और स्थानीय हितों के बीच संतुलन बनाने में मदद करती हैं।

रामसर दर्जा भी इस परियोजना को विशेष महत्व देता है। रामसर साइटें वे आर्द्रभूमियां होती हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी पारिस्थितिक महत्ता और जैव विविधता के लिए मान्यता मिली होती है। ऐसे क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन, आवास संरक्षण और जनसहभागिता, तीनों एक साथ जरूरी हो जाते हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • रामसर साइटें Ramsar Convention on Wetlands के तहत सूचीबद्ध आर्द्रभूमियां होती हैं।
  • रामसर सम्मेलन 1971 में ईरान के रामसर शहर में अपनाया गया था।
  • JICA का पूरा नाम Japan International Cooperation Agency है।
  • इको-डेवलपमेंट कमेटियां भारत में वन्यजीव और वन प्रबंधन में समुदाय आधारित भूमिका निभाती हैं।

नलसरोवर में शुरू हुई यह परियोजना संरक्षण और स्थानीय भागीदारी का ऐसा मॉडल है, जो आर्द्रभूमि की स्वच्छता, जैव विविधता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, तीनों को एक साथ मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

Originally written on August 11, 2026 and last modified on August 11, 2026.

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