केरल की वन नीति में आदिवासी भागीदारी को नई जगह

केरल की वन नीति में आदिवासी भागीदारी को नई जगह

केरल ने राज्य वन्यजीव बोर्ड में पहली बार दो आदिवासी प्रतिनिधियों को शामिल कर वन संरक्षण और प्रशासन में समुदाय-आधारित भागीदारी की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। 11 अगस्त 2026 को घोषित इस फैसले के तहत मन्नान समुदाय के रमन राजा मन्नान और नीलांबुर के चोलानायक्कन समुदाय से जुड़े शोधकर्ता विनोद को बोर्ड में जगह दी गई।

वन्यजीव बोर्ड में आदिवासी प्रतिनिधित्व क्यों अहम है

राज्य वन्यजीव बोर्ड केरल में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में काम करता है और वन्यजीव प्रबंधन, वन संरक्षण तथा इससे जुड़ी नीतिगत चर्चाओं में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। आदिवासी प्रतिनिधियों को इसमें शामिल करने का अर्थ है कि जंगलों के साथ पीढ़ियों से जुड़े समुदायों का पारंपरिक ज्ञान अब औपचारिक निर्णय-प्रक्रिया का हिस्सा बनेगा। सरकार ने इस कदम को वन प्रबंधन में पारंपरिक समझ और स्थानीय अनुभव के उपयोग से जोड़ा है।

यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि जंगलों में रहने वाले समुदाय अक्सर वन्यजीव संरक्षण, मानव-वन्यजीव संघर्ष और संसाधन प्रबंधन के सबसे प्रत्यक्ष अनुभव रखते हैं। ऐसे में उनकी भागीदारी नीतियों को अधिक व्यावहारिक और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बना सकती है।

नीलांबुर और थेक्कडी से जुड़ा संदर्भ

रमन राजा मन्नान को मन्नान जनजाति के राजा के रूप में पहचाना जाता है, जबकि विनोद चोलानायक्कन समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले शोधकर्ता हैं। नीलांबुर, जो मलप्पुरम जिले में स्थित है, चोलानायक्कन समुदाय से जुड़ा क्षेत्र माना जाता है। दूसरी ओर थेक्कडी, इडुक्की जिले में स्थित है और पेरियार टाइगर रिजर्व के लिए प्रसिद्ध है।

यह घोषणा थेक्कडी में आयोजित ‘ऊरुनरवु’ कार्यक्रम के दौरान की गई, जो वन विभाग की एक जनसंपर्क पहल है। यह कार्यक्रम पेरियार टाइगर रिजर्व में आयोजित हुआ और इसका दूसरा सत्र था। इससे पहले 23 जुलाई 2026 को नीलांबुर में पहला संवाद आयोजित किया गया था। इस पहल का उद्देश्य आदिवासी समुदायों और वन अधिकारियों के बीच संवाद बढ़ाना तथा वन-प्रशासन में समुदाय की भागीदारी को मजबूत करना है।

पर्यटन, संरक्षण और आदिवासी कल्याण से जुड़ी योजनाएं

केरल सरकार ने केंद्र सरकार को भेजे जाने के लिए 50 करोड़ रुपये की एक इकोटूरिज्म परियोजना का प्रस्ताव भी तैयार किया है। इसमें थेक्कडी में 20 करोड़ रुपये की लागत से एक टाइगर म्यूजियम बनाने की योजना शामिल है। इसके साथ ही मानव-वन्यजीव संघर्ष को बेहतर ढंग से समझने और संभालने के लिए पारंपरिक आदिवासी ज्ञान के दस्तावेजीकरण की बात भी सामने आई है।

अधिकारियों ने आदिवासी बस्तियों में सड़क, स्ट्रीट लाइट और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं की जरूरत पर भी जोर दिया है। इससे स्पष्ट है कि वन्यजीव संरक्षण की चर्चा अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसमें स्थानीय समुदायों के जीवन, आजीविका और बुनियादी विकास को भी जोड़ा जा रहा है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • केरल का राज्य वन्यजीव बोर्ड मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में काम करता है।
  • पेरियार टाइगर रिजर्व केरल के इडुक्की जिले के थेक्कडी क्षेत्र में स्थित है।
  • नीलांबुर मलप्पुरम जिले में है और चोलानायक्कन समुदाय से जुड़ा माना जाता है।
  • राज्य वन्यजीव बोर्ड वन्यजीव संरक्षण और राज्य स्तरीय नीति-निर्माण से संबंधित होता है।

इस फैसले से केरल में वन संरक्षण, आदिवासी भागीदारी और स्थानीय ज्ञान के उपयोग को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश दिखाई देती है। आने वाले समय में यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी एक संदर्भ बन सकता है।

Originally written on August 12, 2026 and last modified on August 12, 2026.

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