झारखंड के हजारीबाग में मिला 3200 वर्ष पुरानी सभ्यता का प्रमाण
झारखंड के हजारीबाग जिले के चौपारण प्रखंड में स्थित मोहाने नदी बेसिन क्षेत्र से एक प्राचीन बहुस्तरीय सभ्यता के प्रमाण मिले हैं। देहर, सोहरा, मंगरह और हथिंदर जैसे गांवों में खेती और भवन निर्माण के दौरान कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह क्षेत्र लगभग 3200 वर्ष पुरानी बस्ती का संकेत देता है, जो भारतीय इतिहास और पुरातत्व के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पुरातात्विक खोज का महत्व
पुरातत्वविदों के अनुसार इस क्षेत्र में अलग-अलग ऐतिहासिक कालखंडों के प्रमाण मौजूद हैं। यहां निवास स्थलों की परतें, मलबा क्षेत्र और जमीन के भीतर दबे बड़े ढांचे पाए गए हैं। इससे संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र लंबे समय तक मानव बस्ती और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा होगा। चौपारण क्षेत्र में पिछले कई दशकों से प्राचीन मूर्तियां, मिट्टी के बर्तन और धार्मिक अवशेष मिलते रहे हैं। नई खोजों ने इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को और अधिक मजबूत किया है।
ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार से हुआ सर्वे
इस क्षेत्र का सर्वेक्षण भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT-ISM) धनबाद और विश्वभारती विश्वविद्यालय की टीमों द्वारा किया गया। वैज्ञानिकों ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (GPR) तकनीक का उपयोग कर जमीन के भीतर मौजूद संरचनाओं का पता लगाया। सर्वे में 100 फीट से अधिक लंबाई वाले बड़े दबे हुए ढांचे और अन्य असामान्य संरचनाओं की पहचान की गई। GPR तकनीक बिना खुदाई किए जमीन के अंदर की वस्तुओं और संरचनाओं का पता लगाने में उपयोगी होती है। इससे पुरातात्विक स्थलों को नुकसान पहुंचाए बिना प्रारंभिक अध्ययन संभव हो पाता है।
प्राचीन बर्तन और धार्मिक मूर्तियां मिलीं
इस क्षेत्र से नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (NBPW) के नमूने भी प्राप्त हुए हैं। यह विशेष प्रकार की काली चमकदार मिट्टी की वस्तु मानी जाती है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के प्रारंभिक ऐतिहासिक काल से जुड़ी हुई है। ऐसे बर्तन प्राचीन शहरी सभ्यताओं और व्यापारिक गतिविधियों के संकेत माने जाते हैं। इसके अलावा यहां गौतम बुद्ध, तारा, मारीची, अवलोकितेश्वर, ब्रह्मा, विष्णु, महेश और गणेश की मूर्तियां भी मिली हैं। इससे स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र बौद्ध और हिंदू दोनों धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा।
प्राचीन बौद्ध स्तूप की पहचान
मंगरह गांव में स्थित एक बड़े टीले को लगभग 2500 से 3000 वर्ष पुराने बौद्ध स्तूप के रूप में पहचाना गया है। स्तूप बौद्ध धर्म में स्मारक और धार्मिक महत्व की संरचनाएं होती हैं, जिनका उपयोग महापुरुषों की स्मृति और धार्मिक गतिविधियों के लिए किया जाता था। इतिहासकारों और संरक्षण विशेषज्ञों ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से इस स्थल को संरक्षित करने की मांग की है। उनका मानना है कि यदि समय रहते संरक्षण नहीं किया गया तो यह महत्वपूर्ण धरोहर क्षतिग्रस्त हो सकती है।
भारतीय इतिहास में क्षेत्र का महत्व
हजारीबाग का चौपारण क्षेत्र प्राचीन काल से सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र माना जाता रहा है। यहां मिले बौद्ध और हिंदू प्रतीक विभिन्न ऐतिहासिक कालों के सांस्कृतिक समन्वय को दर्शाते हैं। यह खोज झारखंड के इतिहास को नई पहचान देने के साथ-साथ पूर्वी भारत की प्राचीन सभ्यताओं के अध्ययन में भी सहायक हो सकती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (GPR) बिना खुदाई के जमीन के अंदर की संरचनाओं का पता लगाने की तकनीक है।
- नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर प्रारंभिक ऐतिहासिक काल से जुड़ा विशेष प्रकार का मिट्टी का बर्तन है।
- स्तूप बौद्ध धर्म की महत्वपूर्ण स्मारक संरचनाएं होती हैं।
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) भारत में पुरातात्विक अनुसंधान और स्मारक संरक्षण की प्रमुख संस्था है।
हजारीबाग में मिली यह पुरातात्विक खोज भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि आगे की खुदाई और वैज्ञानिक अध्ययन से इस क्षेत्र के इतिहास से जुड़े कई नए तथ्य सामने आ सकते हैं।