नल्लमाला टाइगर रिजर्व में 1,400 वर्षों पुराने 25 अभिलेखों की खोज, प्राचीन इतिहास पर नई रोशनी

नल्लमाला टाइगर रिजर्व में 1,400 वर्षों पुराने 25 अभिलेखों की खोज, प्राचीन इतिहास पर नई रोशनी

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की अभिलेख शाखा ने 13 जून 2026 को पूर्ण हुए एक विशेष सर्वेक्षण के दौरान नल्लमाला टाइगर रिजर्व वन क्षेत्र में 25 प्राचीन अभिलेखों का दस्तावेजीकरण और प्रतिलिपि तैयार की है। ये अभिलेख दूसरी शताब्दी ईस्वी से लेकर 16वीं शताब्दी ईस्वी तक की लगभग 1,400 वर्षों की ऐतिहासिक अवधि को दर्शाते हैं। इनमें तेलुगु, कन्नड़, प्राकृत भाषाओं तथा ब्राह्मी लिपि में लिखे गए महत्वपूर्ण अभिलेख शामिल हैं। यह खोज दक्षिण भारत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और भाषाई इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

अभिलेख विज्ञान क्या है?

अभिलेख विज्ञान या एपिग्राफी (Epigraphy) पत्थर, धातु, चट्टानों और अन्य टिकाऊ सतहों पर उत्कीर्ण लेखों के अध्ययन से संबंधित विद्या है। भारत में अभिलेख इतिहास लेखन का एक महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं। इनके माध्यम से विभिन्न राजवंशों, प्रशासनिक व्यवस्थाओं, धार्मिक संरक्षण, भूमि अनुदानों और भाषाई विकास की जानकारी प्राप्त होती है। इसी कारण पुरातत्वविद और इतिहासकार प्राचीन अभिलेखों को अतीत को समझने का विश्वसनीय माध्यम मानते हैं।

तेलुगु और कन्नड़ अभिलेखों की खोज

सर्वेक्षण के दौरान 11 जून 2026 को गंगाराम पेंटा, मीतोंटा, पालितला, पोनालाबावी और जिलालापडुगु जैसे गांवों से सातवीं से 16वीं शताब्दी ईस्वी के बीच के आठ तेलुगु अभिलेखों की प्रतिलिपियां तैयार की गईं। इसके बाद 12 जून 2026 को कन्नड़ और तेलुगु लिपियों में लिखे गए दस अन्य अभिलेखों का दस्तावेजीकरण किया गया। ये अभिलेख कल्याणी चालुक्य, पोटापी चोल, काकतीय और विजयनगर काल से संबंधित पाए गए। इन अभिलेखों से मध्यकालीन दक्षिण भारतीय राज्यों की राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की संभावना है।

सातवाहन काल के दुर्लभ अभिलेख

13 जून 2026 को सर्वेक्षण दल को सात और अभिलेख प्राप्त हुए, जिनमें सातवाहन काल से संबंधित दुर्लभ अभिलेख भी शामिल हैं। ये अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखे गए हैं। सातवाहन राजवंश दक्षिण भारत के प्राचीन इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और उसके अभिलेख दक्कन क्षेत्र की राजनीतिक और सामाजिक संरचना को समझने में विशेष महत्व रखते हैं।

कृष्णा नदी तट पर प्राचीन शैलचित्र

सर्वेक्षण के दौरान नल्लमाला टाइगर रिजर्व के भीतर कृष्णा नदी के तट पर स्थित अलातम क्षेत्र में प्राचीन शैलचित्रों की भी पहचान की गई। इन चित्रों में महापाषाणीय (Megalithic) और प्रारंभिक ऐतिहासिक काल की कलाकृतियां शामिल हैं। प्रारंभिक आकलन के अनुसार इनका काल लगभग 1500 ईसा पूर्व माना जा रहा है। भारत में शैलचित्रों को प्रागैतिहासिक, महापाषाणीय और प्रारंभिक ऐतिहासिक चरणों में वर्गीकृत किया जाता है। ये चित्र प्राचीन मानव जीवन, संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं की झलक प्रस्तुत करते हैं।

सर्वेक्षण में उल्लेखित प्रमुख राजवंश

इस सर्वेक्षण में प्राप्त सामग्री का संबंध अनेक महत्वपूर्ण दक्षिण भारतीय राजवंशों से पाया गया है। इनमें सातवाहन, पूर्वी चालुक्य, रेड्डी, कल्याणी चालुक्य, पोटापी चोल, काकतीय और विजयनगर राजवंश शामिल हैं। इन राजवंशों ने विभिन्न कालखंडों में दक्षिण भारत के इतिहास, प्रशासन, कला और संस्कृति को प्रभावित किया।

ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा का महत्व

ब्राह्मी भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन लिपियों में से एक मानी जाती है। अनेक प्रारंभिक भारतीय अभिलेख इसी लिपि में लिखे गए हैं। प्राकृत भाषा भी प्राचीन भारत में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती थी और अनेक शासकों ने अपने अभिलेख इसी भाषा में अंकित कराए थे। इन दोनों का अध्ययन भारतीय इतिहास और भाषाविज्ञान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की स्थापना वर्ष 1861 में हुई थी।
  • एपिग्राफी का अर्थ अभिलेखों के अध्ययन से है।
  • ब्राह्मी भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन लिपियों में से एक है।
  • सातवाहन अभिलेख दक्कन क्षेत्र के इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं।
  • नल्लमाला टाइगर रिजर्व पूर्वी घाट क्षेत्र में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के वन क्षेत्रों में फैला हुआ है।
  • कृष्णा नदी प्रायद्वीपीय भारत की प्रमुख नदियों में से एक है।
  • भारतीय शैलचित्रों को प्रागैतिहासिक, महापाषाणीय और प्रारंभिक ऐतिहासिक चरणों में वर्गीकृत किया जाता है।

नल्लमाला टाइगर रिजर्व में मिले इन 25 प्राचीन अभिलेखों और शैलचित्रों की खोज भारतीय इतिहास और पुरातत्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यह खोज न केवल दक्षिण भारत के विभिन्न राजवंशों और भाषाओं के विकास पर नई जानकारी प्रदान करेगी, बल्कि प्राचीन मानव सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत को समझने में भी महत्वपूर्ण योगदान देगी।

Originally written on June 13, 2026 and last modified on June 13, 2026.

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