जोंनागिरी गोल्ड प्रोजेक्ट: भारत की पहली बड़ी निजी स्वर्ण खदान
भारत के खनन क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि जुड़ने जा रही है। आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में स्थित जोंनागिरी गोल्ड प्रोजेक्ट देश की आजादी के बाद पहली बड़ी निजी स्वर्ण खदान के रूप में शुरू होने जा रहा है। यह परियोजना भारत की सोने के आयात पर भारी निर्भरता को कम करने और खनिज क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
भारत में सोने की मांग हमेशा से बहुत अधिक रही है, लेकिन घरेलू उत्पादन बेहद सीमित रहा है। ऐसे में जोंनागिरी परियोजना न केवल आर्थिक दृष्टि से बल्कि रणनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण बन जाती है।
भारत की सोने के आयात पर निर्भरता
भारत हर वर्ष 800 टन से अधिक सोना आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर लगातार दबाव बना रहता है। दशकों से देश में सोने का घरेलू उत्पादन बहुत कम रहा है। कर्नाटक की सरकारी हुत्ती गोल्ड माइंस वर्तमान में देश की एकमात्र प्रमुख स्वर्ण उत्पादक इकाई है, जो लगभग 1.5 टन सोना प्रतिवर्ष उत्पादन करती है।
साल 2000 में कर्नाटक की ऐतिहासिक कोलार गोल्ड फील्ड्स के बंद होने के बाद बड़े पैमाने पर स्वर्ण उत्पादन में बड़ी कमी आ गई थी। इसके बाद भारत वैश्विक बाजारों पर और अधिक निर्भर हो गया।
जोंनागिरी परियोजना और उसका विस्तार
जोंनागिरी गोल्ड माइन लगभग 598 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है, जिसमें जोंनागिरी, एर्रागुडी और पगिदिरायी गांव शामिल हैं। इस परियोजना को जियोमैसोर सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा विकसित किया जा रहा है, जिसे थ्रिवेनी अर्थमूवर्स एंड इंफ्रा और डेक्कन गोल्ड माइंस लिमिटेड का समर्थन प्राप्त है।
अब तक इस परियोजना में 400 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया जा चुका है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू द्वारा मई 2026 की शुरुआत में इसे राष्ट्र को समर्पित किए जाने की संभावना है।
उत्पादन क्षमता और आर्थिक महत्व
इस परियोजना का प्रोसेसिंग प्लांट केवल 13 महीनों में पूरा कर लिया गया है और अब यह प्री-कमर्शियल संचालन के अंतिम चरण में है। प्रमाणित संसाधनों के अनुसार यहां 13.1 टन सोने का भंडार है, जबकि विस्तृत खोज में यह मात्रा 42.5 टन तक पहुंच सकती है।
अपनी अधिकतम क्षमता पर यह खदान अगले 15 वर्षों तक हर साल लगभग 1,000 किलोग्राम शुद्ध सोना उत्पादन कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना भारत में निजी क्षेत्र को सोना और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की खोज में निवेश के लिए प्रेरित करेगी।
चट्टान से डोरे गोल्ड बार तक की प्रक्रिया
सोना निकालने की प्रक्रिया ओपन-पिट माइनिंग से शुरू होती है, जिसमें ड्रिलिंग और नियंत्रित विस्फोट के जरिए कठोर चट्टानों को तोड़ा जाता है। इसके बाद सोना युक्त अयस्क को प्रोसेसिंग प्लांट तक पहुंचाया जाता है, जहां उसे बारीक कणों में पीसा जाता है।
गुरुत्वाकर्षण पृथक्करण के माध्यम से मोटे सोने को अलग किया जाता है, जबकि महीन कणों को कार्बन-इन-लीच प्रणाली में भेजा जाता है, जहां सायनाइड घोल से सोना घोला जाता है। फिर सक्रिय कार्बन उस घुले हुए सोने को अवशोषित करता है। अंत में स्मेल्टिंग भट्टियों में इसे डोरे गोल्ड बार के रूप में ढाला जाता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- जोंनागिरी, आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में स्थित है और यह भारत की पहली बड़ी निजी स्वर्ण खदान मानी जा रही है।
- हुत्ती गोल्ड माइंस, कर्नाटक में स्थित भारत की प्रमुख सरकारी स्वर्ण उत्पादक इकाई है।
- कोलार गोल्ड फील्ड्स कर्नाटक में स्थित भारत की सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्वर्ण खदान थी, जो वर्ष 2000 में बंद हो गई।
- डोरे बार शुद्ध सोने से पहले की अवस्था होती है, जिसमें सोने के साथ अन्य धातुएं भी मिश्रित रहती हैं।
जोंनागिरी गोल्ड प्रोजेक्ट भारत के खनन और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। यह न केवल सोने के आयात पर निर्भरता कम करेगा, बल्कि निजी निवेश, रोजगार और खनिज क्षेत्र में नई संभावनाओं को भी बढ़ावा देगा। आने वाले वर्षों में यह परियोजना भारत की स्वर्ण नीति और संसाधन सुरक्षा का मजबूत आधार बन सकती है।