जन्म-मृत्यु पंजीकरण में सख्ती, देर से दर्ज कराने पर नई प्रक्रिया
लोकसभा में 29 जुलाई 2026 को जन्म और मृत्यु पंजीकरण से जुड़ा संशोधन विधेयक पेश किया गया। इस प्रस्ताव का उद्देश्य 1969 के मूल कानून में बदलाव कर देर से होने वाले पंजीकरण के लिए अधिक स्पष्ट, सख्त और सत्यापन-आधारित प्रक्रिया लागू करना है। सरकार का मानना है कि इससे नागरिक पंजीकरण व्यवस्था मजबूत होगी और जन्म-मृत्यु से जुड़े रिकॉर्ड अधिक विश्वसनीय बनेंगे।
मूल कानून और उसका महत्व
जन्म और मृत्यु का पंजीकरण भारत में एक अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया है। Registration of Births and Deaths Act, 1969 देश में इन घटनाओं के रिकॉर्ड रखने का प्रमुख कानून है। यही रिकॉर्ड पहचान, नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों, सार्वजनिक स्वास्थ्य आंकड़ों और प्रशासनिक कामकाज में आधार का काम करते हैं। इसलिए इस व्यवस्था में किसी भी बदलाव का असर सीधे सरकारी रिकॉर्ड और नागरिक सेवाओं पर पड़ता है।
देर से पंजीकरण के लिए क्या बदलेगा
प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, यदि जन्म या मृत्यु का पंजीकरण एक से दो वर्ष की देरी से कराया जाता है, तो इसके लिए पहले की तरह जिला मजिस्ट्रेट, उप-जिला मजिस्ट्रेट या संबंधित क्षेत्राधिकार वाले कार्यपालक मजिस्ट्रेट की मंजूरी लेनी होगी। लेकिन यदि देरी दो वर्ष से अधिक है, तो अब मंजूरी के लिए प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश जरूरी होगा।इस बदलाव का सबसे अहम पहलू यह है कि दो वर्ष से अधिक की देरी वाले मामलों में निर्णय की जिम्मेदारी कार्यपालिका से हटाकर न्यायपालिका को दी जा रही है। इससे प्रक्रिया में अधिक कानूनी जांच और औपचारिकता जुड़ जाएगी।
सत्यापन और शुल्क की नई व्यवस्था
विधेयक में यह भी प्रावधान है कि संबंधित प्राधिकारी जन्म या मृत्यु की प्रामाणिकता और सही विवरण की जांच करने के बाद ही आदेश जारी करेगा। यानी अब केवल आवेदन देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि दस्तावेजों और तथ्यों की पुष्टि भी जरूरी होगी।इसके अलावा, देर से होने वाले सभी पंजीकरणों पर एक निर्धारित शुल्क लागू होगा। इस शुल्क की राशि बाद में नियमों के जरिए अधिसूचित की जाएगी। सरकार का उद्देश्य देर से पंजीकरण को औपचारिक और जवाबदेह प्रक्रिया के दायरे में लाना है, ताकि रिकॉर्ड में त्रुटि या फर्जीवाड़े की संभावना कम हो।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- जन्म और मृत्यु का पंजीकरण भारत में अनिवार्य नागरिक पंजीकरण व्यवस्था का हिस्सा है।
- Registration of Births and Deaths Act, 1969 इस विषय का मुख्य केंद्रीय कानून है।
- एक से दो वर्ष की देरी वाले मामलों में जिला मजिस्ट्रेट, उप-जिला मजिस्ट्रेट या कार्यपालक मजिस्ट्रेट की मंजूरी प्रस्तावित है।
- दो वर्ष से अधिक देरी होने पर प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश जरूरी होगा।
यह संशोधन विधेयक देर से पंजीकरण की प्रक्रिया को अधिक कड़ा और प्रमाण-आधारित बनाने की दिशा में कदम माना जा रहा है। इससे जन्म और मृत्यु के आधिकारिक रिकॉर्ड की विश्वसनीयता बढ़ने की उम्मीद है।