चिकित्सा उपकरण नियमों में वैश्विक बदलाव: भारत समेत प्रमुख देशों ने तेज किए नियामक सुधार
दुनिया भर में चिकित्सा उपकरण (मेडिकल डिवाइस) क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहा है और इसके साथ ही विभिन्न देशों की सरकारें भी नियामक व्यवस्था को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और सुरक्षित बनाने पर जोर दे रही हैं। वर्ष 2026 में भारत, यूरोपीय संघ (ईयू), यूनाइटेड किंगडम (यूके) और संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) ने चिकित्सा उपकरणों से संबंधित कई महत्वपूर्ण नियामक बदलाव लागू किए या प्रस्तावित किए हैं। इन सुधारों का उद्देश्य लाइसेंस प्रक्रिया को सरल बनाना, गुणवत्ता मानकों को मजबूत करना, उत्पादों की ट्रेसबिलिटी बढ़ाना और रोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
भारत में विनिर्माण लाइसेंस प्रक्रिया होगी तेज
भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 28 जून 2026 को मेडिकल डिवाइसेज रूल्स, 2017 में संशोधन का प्रस्ताव रखा। इसके अनुसार क्लास बी चिकित्सा उपकरणों के विनिर्माण लाइसेंस की समय-सीमा 140 दिनों से घटाकर 115 दिन करने का प्रस्ताव है। क्लास बी उपकरणों को कम से मध्यम जोखिम वाली श्रेणी में रखा जाता है। इसी प्रस्ताव के तहत क्लास सी और क्लास डी उपकरणों के लाइसेंस की समय-सीमा 105 दिनों से घटाकर 90 दिन करने का भी प्रावधान किया गया है। क्लास सी और डी उपकरण भारतीय नियामक ढांचे में उच्च जोखिम वाली श्रेणियों में आते हैं। इन बदलावों से उद्योगों को तेज मंजूरी मिलने के साथ निवेश और नवाचार को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
मेडिकल डिवाइसेज नियमों में नए संशोधन
भारत में मेडिकल डिवाइसेज रूल्स, 2017 चिकित्सा उपकरणों के आयात, निर्माण, बिक्री, वितरण और लाइसेंसिंग को नियंत्रित करते हैं। मेडिकल डिवाइसेज (संशोधन) नियम, 2026 के तहत स्टरलाइजेशन लेबलिंग को अनिवार्य बनाया गया है, अनुपालन निगरानी को और सख्त किया गया है, सरकारी शुल्कों को अद्यतन किया गया है तथा डिजिटल फाइलिंग प्रणाली को भी शामिल किया गया है। भारत में चिकित्सा उपकरणों को जोखिम के आधार पर क्लास ए, क्लास बी, क्लास सी और क्लास डी में वर्गीकृत किया जाता है। यही वर्गीकरण लाइसेंसिंग, नियामक नियंत्रण और बाजार में उपलब्ध उत्पादों की निगरानी का आधार बनता है।
यूरोपीय संघ और यूनाइटेड किंगडम के नए नियम
यूरोपीय संघ ने यूरोपियन डेटाबेस ऑन मेडिकल डिवाइसेज (EUDAMED) के चार प्रमुख मॉड्यूल 28 मई 2026 से अनिवार्य कर दिए हैं। यह डेटाबेस निर्माताओं, आयातकों, अधिकृत प्रतिनिधियों, नोटिफाइड बॉडीज़ और राष्ट्रीय प्राधिकरणों के लिए केंद्रीय पंजीकरण और नियामक सूचना प्रणाली के रूप में कार्य करता है। वहीं, यूनाइटेड किंगडम की मेडिसिन्स एंड हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स रेगुलेटरी एजेंसी (MHRA) ने 26 मई 2026 को नए प्री-मार्केट नियम जारी किए। इनके तहत मरीजों के लिए इम्प्लांट कार्ड अनिवार्य किए गए हैं तथा सभी संबंधित उपकरणों पर यूनिक डिवाइस आइडेंटिफायर (UDI) लागू करना आवश्यक होगा, जिससे उत्पादों की ट्रेसबिलिटी बेहतर हो सके।
अमेरिका में गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली को मिला नया स्वरूप
संयुक्त राज्य अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने 2 फरवरी 2026 से 21 CFR Part 820 की जगह क्वालिटी मैनेजमेंट सिस्टम रेगुलेशन (QMSR) लागू कर दिया है। यह नया ढांचा अंतरराष्ट्रीय मानक ISO 13485:2016 के अनुरूप तैयार किया गया है, जिससे वैश्विक गुणवत्ता मानकों के साथ बेहतर तालमेल स्थापित हो सके। इसके अतिरिक्त, मिसिसिपी बोर्ड ऑफ फार्मेसी ने मेडिकल डिवाइस एस्टैब्लिशमेंट लाइसेंस को अनिवार्य बनाया है, जिसकी प्रारंभिक लाइसेंसिंग 1 जुलाई 2026 तक पूरी करना आवश्यक है। नए नियमों में “डिवाइस” की परिभाषा का विस्तार करते हुए पेशेवर उपयोग के लिए प्रिस्क्रिप्शन डिवाइस भी शामिल किए गए हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- ISO 13485:2016 चिकित्सा उपकरण निर्माण के लिए गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली का अंतरराष्ट्रीय मानक है।
- यूनिक डिवाइस आइडेंटिफायर (UDI) चिकित्सा उपकरणों की पहचान और ट्रेसबिलिटी सुनिश्चित करने वाली वैश्विक प्रणाली है।
- नोटिफाइड बॉडीज़ यूरोपीय संघ के चिकित्सा उपकरण कानून के तहत अनुरूपता मूल्यांकन करने वाले अधिकृत संगठन होते हैं।
- इन विट्रो डायग्नोस्टिक (IVD) उपकरण यूरोपीय संघ में अलग IVDR नियामक ढांचे के अंतर्गत नियंत्रित किए जाते हैं।
विश्व स्तर पर चिकित्सा उपकरण क्षेत्र में हो रहे ये नियामक सुधार दर्शाते हैं कि सरकारें रोगी सुरक्षा, उत्पाद गुणवत्ता और उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को समान महत्व दे रही हैं। भारत सहित प्रमुख देशों द्वारा लाइसेंस प्रक्रिया में तेजी, डिजिटल निगरानी, अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों और बेहतर ट्रेसबिलिटी पर दिया जा रहा जोर भविष्य में चिकित्सा उपकरण उद्योग को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और नवाचार-उन्मुख बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।