कोयला खदानों की वैज्ञानिक बंदी के लिए भारत-जर्मनी सहयोग
कोयला मंत्रालय 22 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में जर्मनी की विकास एजेंसी GIZ के साथ एक कार्यान्वयन समझौते पर हस्ताक्षर करने जा रहा है। यह सहयोग उन कोयला खदानों पर केंद्रित होगा जो बंद होने की प्रक्रिया में हैं या भविष्य में बंद की जाएंगी। समझौते का उद्देश्य खदान बंदी को वैज्ञानिक, पर्यावरण-संवेदनशील और दीर्घकालिक भूमि उपयोग से जोड़ना है।
समझौते का फोकस क्या होगा
इस तकनीकी सहयोग के तहत वैज्ञानिक खदान बंदी, संस्थागत क्षमता निर्माण, ज्ञान साझा करने और खदान बंद होने के बाद विकास से जुड़े पहलुओं पर काम किया जाएगा। इसका मतलब केवल खदान को बंद करना नहीं, बल्कि उस जमीन को सुरक्षित, स्थिर और उपयोगी बनाना भी है। भारत में खदान बंदी की प्रक्रिया अब अधिक व्यवस्थित तरीके से की जा रही है, जिसमें भूमि स्थिरीकरण, पर्यावरण प्रबंधन और बाद के उपयोग की योजना शामिल होती है। ऐसे प्रयास खनन क्षेत्रों में जल संसाधनों, भूमि सुरक्षा और स्थानीय विकास के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
GIZ की भूमिका और भारत में तकनीकी सहयोग
Deutsche Gesellschaft für Internationale Zusammenarbeit यानी GIZ जर्मनी की विकास एजेंसी है, जो ऊर्जा, पर्यावरण और सुशासन जैसे क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परियोजनाओं पर काम करती है। भारत में ऐसे तकनीकी समझौते नीति क्रियान्वयन, क्षमता निर्माण और बेहतर तकनीकी प्रथाओं के हस्तांतरण में मदद करते हैं। कोयला क्षेत्र में यह साझेदारी इसलिए अहम है क्योंकि देश में खदान बंदी अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रही, बल्कि यह पर्यावरणीय पुनर्स्थापन और सतत भूमि उपयोग से भी जुड़ गई है।
खदान बंदी और पुनर्विकास की दिशा
कोयला मंत्रालय ने खदान बंदी और सतत भूमि उपयोग के लिए RECLAIM, L.I.V.E.S. और SUVIKALP जैसे ढांचे अपनाए हैं। इनका उद्देश्य बंद खदानों की जमीन को सुरक्षित तरीके से पुनर्स्थापित करना और उसे भविष्य के उपयोग के लिए तैयार करना है। इसी कार्यक्रम के दौरान मंत्रालय अपनी पहली AAROH यानी Annual Report on Mine Closure भी जारी करेगा। रिपोर्ट के अनुसार, भारत की स्वतंत्रता के बाद से 42 कोयला खदानों की वैज्ञानिक बंदी की जा चुकी है। यह आंकड़ा खनन क्षेत्र में बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाता है, जहां उत्पादन के साथ-साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी अहम हो गई है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- GIZ जर्मनी की विकास एजेंसी है और यह अंतरराष्ट्रीय तकनीकी सहयोग परियोजनाओं में काम करती है।
- वैज्ञानिक खदान बंदी में भूमि स्थिरीकरण, पर्यावरण प्रबंधन और बाद के भूमि उपयोग की योजना शामिल होती है।
- कोयला मंत्रालय ने खदान बंदी और सतत भूमि उपयोग के लिए RECLAIM, L.I.V.E.S. और SUVIKALP जैसे ढांचे अपनाए हैं।
- मंत्रालय की पहली AAROH रिपोर्ट के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद से 42 कोयला खदानों की वैज्ञानिक बंदी की जा चुकी है।
इस कार्यक्रम में केंद्रीय कोयला मंत्री जी. किशन रेड्डी मुख्य अतिथि होंगे, जबकि भूपेंद्र यादव और जितेंद्र सिंह भी उपस्थित रहेंगे। यह पहल भारत में खनन के बाद की जिम्मेदार योजना और पर्यावरणीय प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।