कृत्रिम बुद्धिमत्ता से कोडाइकनाल सौर वेधशाला के 100 वर्षों से अधिक पुराने सौर अभिलेखों का हुआ विश्लेषण

कृत्रिम बुद्धिमत्ता से कोडाइकनाल सौर वेधशाला के 100 वर्षों से अधिक पुराने सौर अभिलेखों का हुआ विश्लेषण

भारत में सौर अनुसंधान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है। शोधकर्ताओं ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की सहायता से तमिलनाडु स्थित कोडाइकनाल सौर वेधशाला के एक शताब्दी से अधिक पुराने हस्तनिर्मित सौर चित्रों का विश्लेषण किया। इस अध्ययन में वर्ष 1904 से 2022 तक के डिजिटाइज़ किए गए सौर चार्टों का उपयोग कर सूर्य की चुंबकीय गतिविधियों का एक सतत और विस्तृत रिकॉर्ड तैयार किया गया। यह शोध भविष्य में सौर चक्रों, अंतरिक्ष मौसम और सूर्य के व्यवहार को बेहतर ढंग से समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

कोडाइकनाल सौर वेधशाला का महत्व

तमिलनाडु में स्थित कोडाइकनाल सौर वेधशाला (कोसो) भारत की सबसे महत्वपूर्ण सौर अनुसंधान संस्थाओं में से एक है। यह वेधशाला कई दशकों से सूर्य के दैनिक अवलोकनों का रिकॉर्ड तैयार करती आ रही है। यहाँ तैयार किए गए हस्तनिर्मित “सनचार्ट” सौर भौतिकी के अध्ययन के लिए एक अमूल्य ऐतिहासिक अभिलेख माने जाते हैं। इन अभिलेखों के माध्यम से वैज्ञानिक लंबे समय तक सूर्य की गतिविधियों में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन कर सकते हैं।

एआई तकनीक से हुआ सौर आंकड़ों का विश्लेषण

इस अध्ययन में यू-नेट आधारित सुपरवाइज़्ड मशीन लर्निंग मॉडल का उपयोग किया गया। इस मॉडल ने डिजिटाइज़ किए गए सनचार्टों में मौजूद “प्लाज” नामक चमकीले और चुंबकीय रूप से सक्रिय क्षेत्रों की पहचान की तथा उनका मानचित्रण किया। यह विश्लेषण वर्ष 1916 से 2007 तक के अवलोकनों पर आधारित था और इसमें नौ पूर्ण सौर चक्रों का डेटा शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने इन आंकड़ों की सहायता से टाइम-लैटिट्यूड बटरफ्लाई डायग्राम तैयार किया। यह सौर भौतिकी में प्रयुक्त एक मानक ग्राफ होता है, जो विभिन्न सौर चक्रों के दौरान सूर्य की चुंबकीय गतिविधियों के अक्षांशीय परिवर्तन को प्रदर्शित करता है। इससे वैज्ञानिकों को सूर्य की दीर्घकालिक चुंबकीय गतिविधियों का अधिक सटीक विश्लेषण करने में सहायता मिलती है।

शोध में शामिल संस्थान और अध्ययन का महत्व

इस शोध का नेतृत्व आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान के शोधकर्ता दिव्य कीर्ति मिश्रा ने किया। अध्ययन में भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, अमेरिका के साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट तथा भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के वैज्ञानिक भी शामिल रहे। शोध के निष्कर्ष खगोल विज्ञान एवं खगोल भौतिकी की प्रतिष्ठित सहकर्मी-समीक्षित पत्रिका द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित किए गए। लगभग 11 वर्ष की अवधि वाले सौर चक्रों का अध्ययन अंतरिक्ष मौसम की भविष्यवाणी, उपग्रह संचार, नेविगेशन प्रणाली तथा पृथ्वी पर पड़ने वाले सौर प्रभावों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे दीर्घकालिक अभिलेख वैज्ञानिकों को सूर्य की बदलती गतिविधियों का व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • प्लाज सूर्य के क्रोमोस्फीयर में पाए जाने वाले चमकीले क्षेत्र होते हैं, जो प्रबल चुंबकीय क्षेत्रों से जुड़े होते हैं।
  • बटरफ्लाई डायग्राम का उपयोग सौर चक्रों के दौरान सूर्य की चुंबकीय गतिविधियों के अक्षांशीय परिवर्तन को दर्शाने के लिए किया जाता है।
  • यू-नेट एक लोकप्रिय कॉन्वोल्यूशनल न्यूरल नेटवर्क आर्किटेक्चर है, जिसका व्यापक उपयोग इमेज सेगमेंटेशन कार्यों में किया जाता है।
  • सौर चक्र लगभग 11 वर्ष का होता है और यह सूर्य की चुंबकीय गतिविधियों में होने वाले नियमित परिवर्तनों को दर्शाता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऐतिहासिक सौर अभिलेखों का यह संयोजन सौर अनुसंधान के क्षेत्र में एक नई दिशा प्रदान करता है। इस अध्ययन से न केवल सूर्य की दीर्घकालिक गतिविधियों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी, बल्कि भविष्य में अंतरिक्ष मौसम के अधिक सटीक पूर्वानुमान और वैज्ञानिक अनुसंधान को भी नई मजबूती मिलेगी।

Originally written on July 2, 2026 and last modified on July 2, 2026.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *