कुद्रेमुख में दुर्लभ नीला फूल, पश्चिमी घाट की नाज़ुक जैव-विविधता फिर चर्चा में
कर्नाटक के चिक्कमगलुरु जिले के कुद्रेमुख क्षेत्र में ट्रेकिंग मार्गों के किनारे नीला-बैंगनी रंग का एक दुर्लभ फूल खिला है, जिसकी बनावट नेलाकुरिंजी से मिलती-जुलती बताई जा रही है। इस फूल ने पश्चिमी घाट के इस संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्र की ओर पर्यटकों का ध्यान फिर खींचा है, जहां ऊंचाई वाले इलाकों में शोला-घासभूमि तंत्र के भीतर कई विशिष्ट वनस्पतियां पाई जाती हैं।
नेलाकुरिंजी से मिलती-जुलती प्रजाति
नेलाकुरिंजी का वैज्ञानिक नाम Strobilanthes kunthiana है और यह पश्चिमी घाट की एक प्रसिद्ध पुष्पीय झाड़ी मानी जाती है। इसकी सबसे बड़ी पहचान इसका सामूहिक फूलना है, जो कई आबादियों में 12 वर्ष के अंतराल पर होता है। कुद्रेमुख में दिखा नीला-बैंगनी फूल रूप-रंग में नेलाकुरिंजी जैसा है, लेकिन स्थानीय अवलोकनों के अनुसार यह खिलना 2022 और 2023 में दर्ज बड़े पैमाने के पुष्पन की तुलना में काफी सीमित और बिखरा हुआ है।
पश्चिमी घाट का नाज़ुक आवास
पश्चिमी घाट भारत की पश्चिमी सीमा के साथ फैली पर्वत श्रृंखला है और इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है। यह क्षेत्र शोला वनों, पर्वतीय घासभूमियों और अनेक स्थानिक पौधों के लिए जाना जाता है, यानी ऐसे पौधे जो केवल इसी पारिस्थितिक क्षेत्र में पाए जाते हैं। इन जंगली फूलों वाली झाड़ियों का सामान्य आवास लगभग 1,300 से 2,400 मीटर की ऊंचाई के बीच माना जाता है। कर्नाटक का कुद्रेमुख राष्ट्रीय उद्यान ऐसे ही वनस्पति आवरण का महत्वपूर्ण संरक्षित क्षेत्र है।
संरक्षण, पर्यटन और स्थानीय ज्ञान
नेलाकुरिंजी का वास्तविक पुष्पन लंबे वनस्पतिक विकास चक्र से जुड़ा होता है और यह एक साथ बड़ी संख्या में फूलने की विशेषता रखता है। केरल में भी 12-वर्षीय पुष्पन चोक्करामुडी की ढलानों पर दर्ज किया गया है, जहां सितंबर-अक्टूबर 2026 में चरम फूल आने की संभावना बताई गई है। इस प्रजाति को 2026 में पहली बार IUCN रेड लिस्ट के लिए आंका गया और इसे संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया। आवास क्षति और पर्यटन का दबाव इसके प्रमुख खतरों में शामिल हैं। इसी कारण कर्नाटक पर्यटन विभाग और स्थानीय वन प्रशासन ने कुद्रेमुख राष्ट्रीय उद्यान में आने वाले पर्यटकों के लिए सुरक्षा और पर्यावरण-अनुकूल यात्रा संबंधी सलाह जारी की है। केरल के मुथुवन जनजातीय समुदाय में ऐसे बिखरे हुए झूठे फूलों के लिए “कल्लप्पूव” शब्द का प्रयोग किया जाता है, जो इस क्षेत्र की पारंपरिक पारिस्थितिक समझ को भी दर्शाता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- नेलाकुरिंजी का वैज्ञानिक नाम Strobilanthes kunthiana है।
- यह पौधा पश्चिमी घाट में लगभग 12 वर्ष के अंतराल पर सामूहिक रूप से फूलने के लिए प्रसिद्ध है।
- पश्चिमी घाट को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल और जैव-विविधता हॉटस्पॉट माना जाता है।
- कुद्रेमुख राष्ट्रीय उद्यान कर्नाटक के चिक्कमगलुरु जिले में स्थित है।
कुद्रेमुख में दिखा यह दुर्लभ फूल केवल एक प्राकृतिक दृश्य नहीं, बल्कि पश्चिमी घाट की नाज़ुक जैव-विविधता, संरक्षण चुनौतियों और जिम्मेदार पर्यटन की जरूरत की याद भी दिलाता है।