किशकिंधा पहाड़ियों में बाघ की वापसी से वन्यजीव गलियारे पर नई नजर
कर्नाटक के कोप्पल जिले की किशकिंधा पहाड़ियों में लगभग पांच दशक बाद बाघ की मौजूदगी दर्ज की गई है। वन विभाग ने 24 अगस्त 2026 को एक नर बाघ की पुष्टि की, जबकि 23 अगस्त 2026 को तेम्बा गांव में लगाए गए कैमरा ट्रैप में उसकी तस्वीर कैद हुई। इस खोज को क्षेत्र में वन्यजीवों की वापसी और संभावित गलियारे की सक्रियता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
कैसे मिली बाघ की पुष्टि
वन विभाग ने स्थानीय लोगों की लगातार मिल रही सूचनाओं के बाद सानापुर, बासापुर और तेम्बा गांवों के आसपास 50 कैमरा ट्रैप लगाए थे। इन कैमरों का उद्देश्य जंगल में सीधे प्रवेश किए बिना जानवरों की गतिविधि, आवाजाही और उपस्थिति पर नजर रखना था। कैमरा ट्रैप में बाघ की तस्वीर आने के बाद विभाग ने उसकी मौजूदगी की आधिकारिक पुष्टि की।
यह तरीका वन्यजीव निगरानी में बेहद उपयोगी माना जाता है, क्योंकि इससे जानवरों को परेशान किए बिना उनके व्यवहार और क्षेत्रीय फैलाव का अध्ययन किया जा सकता है। पहाड़ी और घने वन क्षेत्रों में यह तकनीक खास तौर पर प्रभावी होती है।
किशकिंधा पहाड़ियों का पर्यावास क्यों अहम है
किशकिंधा पहाड़ियां उत्तर कर्नाटक के कोप्पल जिले में, हम्पी परिदृश्य के पास स्थित हैं। वन अधिकारियों के अनुसार सानापुर-बासापुर पहाड़ी क्षेत्र में शुष्क पर्णपाती वन और कांटेदार झाड़ियों वाला आवरण है, जो बड़े मांसाहारी जीवों के लिए अनुकूल हो सकता है। ऐसे क्षेत्रों में शिकार प्रजातियों की उपलब्धता और छिपने के लिए पर्याप्त आवरण बाघ जैसे प्राणी के लिए महत्वपूर्ण होता है।
शुष्क पर्णपाती वन वे होते हैं जिनमें सूखे मौसम में पत्तियां झड़ जाती हैं, जबकि कांटेदार झाड़ियां कम वर्षा वाले इलाकों में पाई जाती हैं। इन दोनों प्रकार की वनस्पति का मिश्रण कई बार वन्यजीवों के लिए उपयुक्त आवास तैयार करता है।
गलियारे की भूमिका और सुरक्षा सलाह
वन विभाग ने बाघ के संभावित स्रोत और उसकी आवाजाही की दिशा समझने के लिए एक तकनीकी समिति बनाई है। अधिकारियों को संदेह है कि यह बाघ आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम वन्यजीव गलियारे से यहां पहुंचा हो सकता है। भारत में ऐसे गलियारे वन्यजीवों के आवागमन, प्रजनन और आनुवंशिक विविधता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
साथ ही, विभाग ने हम्पी और आसपास के गांवों के लोगों के लिए सुरक्षा सलाह जारी की है। लोगों से कहा गया है कि वे अकेले जंगल में न जाएं और रात में खुले में न सोएं। यह सावधानी इसलिए जरूरी है ताकि मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका कम रहे और स्थानीय आबादी सुरक्षित रहे।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- बाघ का वैज्ञानिक नाम Panthera tigris है और यह Felidae परिवार का सदस्य है।
- भारत में बाघ को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत अनुसूची I में संरक्षण प्राप्त है।
- बाघ भारत का राष्ट्रीय पशु है और यह Panthera वंश से संबंधित है।
- कैमरा ट्रैप का उपयोग वन्यजीव गणना, निगरानी और गलियारा अध्ययन में व्यापक रूप से किया जाता है।
किशकिंधा पहाड़ियों में बाघ की यह पुष्टि केवल एक वन्यजीव रिकॉर्ड नहीं, बल्कि इस बात का संकेत भी है कि उपयुक्त आवास और गलियारे अब भी बड़े मांसाहारियों की वापसी में भूमिका निभा सकते हैं।