कावेरी जल विवाद में सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख, कर्नाटक को CWMA निर्देश मानने को कहा

कावेरी जल विवाद में सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख, कर्नाटक को CWMA निर्देश मानने को कहा

कावेरी जल बंटवारे को लेकर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के आदेशों का पालन करे और तमिलनाडु को पानी छोड़ने की व्यवस्था सुनिश्चित करे। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त 2026 के लिए तय की है।

कावेरी जल विवाद फिर चर्चा में क्यों

कावेरी नदी दक्षिण भारत की सबसे संवेदनशील अंतर-राज्यीय जल प्रणालियों में से एक है। यह कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के बीच साझा संसाधन है, इसलिए इसके पानी के बंटवारे को लेकर लंबे समय से विवाद चलता रहा है। इस मामले में जल-प्रबंधन, भंडारण, मौसमी उपलब्धता और राज्यों की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना हमेशा चुनौती रहा है।

तमिलनाडु की ओर से दलील दी गई कि उसे 64 टीएमसी के हक के मुकाबले अब तक 14.814 टीएमसी ही मिला है, जिससे लगभग 20 टीएमसी का बैकलॉग बना हुआ है। दूसरी ओर कर्नाटक ने कहा कि उसने 11 अगस्त 2026 तक पहले के 3,500 क्यूसेक प्रतिदिन वाले निर्देश का पालन किया और कई बार उससे अधिक पानी छोड़ा।

CWMA की भूमिका और अदालत की निगरानी

कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण 2018 की योजना के तहत बना एक वैधानिक निकाय है। इसका काम जलाशयों की स्थिति पर नजर रखना, उपलब्ध पानी का आकलन करना और कावेरी बेसिन में जल-रिलीज़ के निर्देश जारी करना है। इसमें मासिक और दैनिक स्तर पर पानी छोड़ने की व्यवस्था भी शामिल होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई में यह भी नोट किया कि कृष्णा राजा सागर जलाशय से छोड़ा गया पानी बिल्लिगुंडलु तक पहुंचा और 17 अगस्त 2026 की सुबह 8 बजे तक आवश्यक 12,000 क्यूसेक से अधिक दर्ज हुआ। अदालत ने CWMA से अगली सुनवाई से पहले ताजा स्थिति रिपोर्ट मांगी है।

कावेरी विवाद की कानूनी पृष्ठभूमि

कावेरी जल विवाद भारत के अंतर-राज्यीय नदी विवाद ढांचे का एक प्रमुख उदाहरण है। कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण ने 2007 में अपना अंतिम फैसला दिया था, जिसे बाद में 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित किया। इसी के बाद CWMA और कावेरी जल विनियमन समिति का गठन किया गया, ताकि जल बंटवारे और अनुपालन की निगरानी अधिक व्यवस्थित तरीके से हो सके।

इस विवाद में बिल्लिगुंडलु एक अहम मापन बिंदु है, जहां कर्नाटक से तमिलनाडु की ओर आने वाले पानी की मात्रा दर्ज की जाती है। वहीं, कृष्णा राजा सागर जैसे जलाशय कर्नाटक के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इन्हीं पर राज्य की सिंचाई और पेयजल जरूरतें काफी हद तक निर्भर करती हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • कावेरी जल विवाद भारत के सबसे पुराने और संवेदनशील अंतर-राज्यीय जल विवादों में गिना जाता है।
  • CWMA का गठन कावेरी जल प्रबंधन योजना, 2018 के तहत किया गया था।
  • कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का अंतिम फैसला 2007 में आया था और सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में उसमें संशोधन किया।
  • बिल्लिगुंडलु कावेरी नदी पर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच एक महत्वपूर्ण जल-मापन केंद्र है।

इस ताजा आदेश से साफ है कि कावेरी जल बंटवारे में अब भी अदालत और वैधानिक संस्थाओं की निगरानी निर्णायक भूमिका निभा रही है। अगली सुनवाई में CWMA की रिपोर्ट और राज्यों की दलीलों से आगे की दिशा तय होगी।

Originally written on August 18, 2026 and last modified on August 18, 2026.

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