कक्षा से रात में रोशनी: स्काईरूट के साथ रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल की साझेदारी

कक्षा से रात में रोशनी: स्काईरूट के साथ रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल की साझेदारी

अमेरिका की कैलिफोर्निया स्थित कंपनी रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल ने 14 अक्टूबर 2026 को हैदराबाद की स्काईरूट एयरोस्पेस के साथ दो समर्पित रॉकेट प्रक्षेपणों का समझौता किया। कंपनी की योजना ऐसे अंतरिक्ष यान तैनात करने की है, जो कक्षा में लगे परावर्तक दर्पणों से सूर्य का प्रकाश चुनिंदा स्थानों तक पहुंचाएं। इसका उद्देश्य रात में जरूरत के अनुसार पृथ्वी के कुछ क्षेत्रों को रोशन करना है।

विक्रम रॉकेट से होंगे दोनों प्रक्षेपण

समझौते के तहत पहला प्रक्षेपण स्काईरूट के विक्रम-1 रॉकेट से और दूसरा विकासाधीन विक्रम-1यू प्रक्षेपण यान से प्रस्तावित है। विक्रम-1यू में अतिरिक्त प्रथम-चरण बूस्टर और बेहतर प्रदर्शन की क्षमता शामिल है। विक्रम-1 ने जुलाई 2026 में अपनी पहली कक्षीय उड़ान पूरी की थी। दोनों प्रक्षेपणों की तारीखों और समझौते की वित्तीय शर्तों का खुलासा नहीं किया गया है।

कक्षा से परावर्तित प्रकाश के संभावित उपयोग

रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल की योजना उपग्रहों का ऐसा समूह बनाने की है, जो मांग के अनुसार सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी की ओर परावर्तित करे। कंपनी के अनुसार, रोशनी की तीव्रता को समायोजित किया जा सकेगा और प्रकाश की पट्टी लगभग पांच किलोमीटर चौड़ी हो सकती है। यह व्यवस्था लक्ष्य-स्थल पर प्रकाश पैदा नहीं करेगी, बल्कि सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करेगी।

प्रस्तावित उपयोगों में आपदा प्रभावित क्षेत्रों में खोज और बचाव अभियान, सौर ऊर्जा संयंत्रों में बिजली उत्पादन का समय बढ़ाना, दूरदराज के औद्योगिक क्षेत्रों को रोशन करना और रक्षा गतिविधियों में सहायता शामिल हैं। कंपनी ने सार्वजनिक आयोजनों में भी इसके संभावित इस्तेमाल का उल्लेख किया है। हालांकि, ये योजनाबद्ध सेवाएं हैं; इनके व्यावहारिक परिणाम और सीमाएं तैनाती के बाद ही स्पष्ट होंगी।

नियामकीय मंजूरी और पर्यावरण संबंधी चिंताएं

अमेरिकी संघीय संचार आयोग (एफसीसी) ने जुलाई 2026 में रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल के प्रदर्शन उपग्रह ‘एरेंडिल-1’ के निर्माण, प्रक्षेपण और संचालन को मंजूरी दी थी। आयोग की प्रमुख भूमिका संचार और रेडियो-आवृत्ति स्पेक्ट्रम के नियमन से जुड़ी है। उसने कहा था कि उसके अधिकार-क्षेत्र से बाहर आने वाले प्रभावों पर निर्णय करना उसकी जिम्मेदारी में नहीं आता।

खगोलविदों और पर्यावरण संगठनों ने रात के आकाश में अतिरिक्त प्रकाश से होने वाले प्रकाश प्रदूषण पर चिंता जताई है। इससे खगोलीय अवलोकन प्रभावित हो सकते हैं और वन्यजीवों तथा मनुष्यों की जैविक घड़ी पर असर पड़ सकता है। इस कारण ऐसी तकनीक के व्यावसायिक उपयोग के साथ उसके पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन भी महत्वपूर्ण होगा।

ऐतिहासिक संदर्भ: ज़्नाम्या प्रयोग

कक्षा से सूर्य का प्रकाश परावर्तित करने का विचार नया नहीं है। 1993 में रूसी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने ज़्नाम्या प्रयोग के तहत कक्षा में लगभग 65 फुट का परावर्तक दर्पण तैनात किया था। इससे पृथ्वी की ओर परावर्तित प्रकाश की चलती हुई किरण भेजी गई। बाद में धन की कमी के कारण यह प्रयोग बंद कर दिया गया।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • विक्रम-1, स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित प्रक्षेपण यान है।
  • अमेरिकी संघीय संचार आयोग संचार क्षेत्र और रेडियो-आवृत्ति स्पेक्ट्रम का नियमन करता है।
  • ज़्नाम्या प्रयोग में 1993 में कक्षा में लगभग 65 फुट का परावर्तक दर्पण तैनात किया गया था।
  • रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल की प्रस्तावित प्रणाली लक्ष्य-स्थल पर प्रकाश उत्पन्न करने के बजाय सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करती है।

यह समझौता निजी अंतरिक्ष कंपनियों के बीच उभरते सहयोग और उपग्रह-आधारित सेवाओं के नए प्रयोगों को दर्शाता है। साथ ही, रात के आकाश और पर्यावरण पर संभावित प्रभावों को लेकर नियमन तथा वैज्ञानिक आकलन की आवश्यकता भी सामने लाता है।

Originally written on October 16, 2026 and last modified on October 16, 2026.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *