ओडिशा सरकार ने शुरू की पारंपरिक बोमकई साड़ी बुनाई को पुनर्जीवित करने की योजना
ओडिशा के हथकरघा, वस्त्र और हस्तशिल्प विभाग ने गंजाम जिले की प्रसिद्ध बोमकई बुनाई परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए विशेष योजना शुरू की है। इस परियोजना का नाम “रिवाइवल ऑफ लैंग्विशिंग प्रोडक्ट्स (कॉटन बोमकई साड़ी)” रखा गया है। राज्य सरकार ने इसे पिछले वित्तीय वर्ष में मंजूरी दी थी। इस पहल का उद्देश्य लुप्त होती मूल बोमकई बुनाई कला को संरक्षित करना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।
बोमकई साड़ी की ऐतिहासिक पहचान
बोमकई साड़ी ओडिशा की पारंपरिक हस्तकरघा कला का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। इसका संबंध गंजाम जिले के बोमकई गांव से है, जहां इस विशेष शैली की शुरुआत हुई थी। इसके अलावा सुबरनपुर जिला भी बोमकई बुनाई का प्रमुख केंद्र माना जाता है। बोमकई साड़ियों की पहचान उनके सुंदर पारंपरिक डिजाइनों, जटिल बॉर्डर और विशिष्ट रंग संयोजन के लिए होती है। यह साड़ी भारत के भौगोलिक संकेतक (GI) अधिनियम के तहत पंजीकृत है, जिससे इसकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को कानूनी संरक्षण मिला हुआ है।
पुनर्जीवन योजना की प्रमुख बातें
राज्य सरकार की इस योजना के तहत पारंपरिक डिजाइनों, मोटिफ और मूल रंग संयोजन का दस्तावेजीकरण किया जाएगा। साथ ही नई पीढ़ी के बुनकरों को मूल बोमकई बुनाई तकनीक का प्रशिक्षण दिया जाएगा। हथकरघा विभाग ने राज्य एजेंसी फॉर डेवलपमेंट ऑफ हैंडलूम क्लस्टर्स के सहयोग से बोमकई गांव में पांच दिवसीय ओरिएंटेशन कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम के दौरान मौजूदा बुनाई तकनीकों, परंपरागत डिजाइनों और बुनकरों की समस्याओं का अध्ययन किया गया। सरकार का उद्देश्य इस पारंपरिक कला को आधुनिक बाजार से जोड़कर बुनकरों की आर्थिक स्थिति मजबूत करना भी है।
केवल दो परिवार बचा रहे परंपरा
23 मई 2026 तक बोमकई गांव में केवल दो परिवार — केशव नायक और सुषांत कुमार नायक — ही मूल बोमकई बुनाई परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। युवा पीढ़ी के पलायन और रोजगार के लिए अन्य राज्यों में जाने के कारण गांव में बुनकरों की संख्या लगातार घटती गई है। स्थिति को देखते हुए सरकार अब गंजाम जिले के आसपास के गांवों के बुनकरों को भी इस परियोजना से जोड़ने की योजना बना रही है। इससे पारंपरिक कला को व्यापक स्तर पर पुनर्जीवित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
हस्तकरघा उद्योग और सरकारी समर्थन
भारत में हस्तकरघा उद्योग ग्रामीण रोजगार और पारंपरिक कला संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम है। विभिन्न राज्य सरकारें और क्लस्टर आधारित विकास एजेंसियां समय-समय पर पारंपरिक शिल्पों के संरक्षण और प्रचार के लिए योजनाएं चलाती हैं। ओडिशा की बोमकई साड़ी देश और विदेश में अपनी कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते संरक्षण और प्रशिक्षण नहीं दिया गया, तो यह ऐतिहासिक बुनाई परंपरा समाप्त हो सकती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- बोमकई साड़ी ओडिशा की प्रसिद्ध पारंपरिक हस्तकरघा साड़ी है।
- बोमकई साड़ी को भौगोलिक संकेतक (GI) दर्जा प्राप्त है।
- सुबरनपुर जिला भी बोमकई बुनाई का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
- भारत में हस्तकरघा विकास के लिए क्लस्टर आधारित योजनाएं चलाई जाती हैं।
ओडिशा सरकार की यह पहल पारंपरिक हस्तकरघा कला के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इससे न केवल बोमकई बुनाई परंपरा को नया जीवन मिलेगा, बल्कि स्थानीय बुनकरों को रोजगार और आर्थिक मजबूती भी प्राप्त हो सकेगी।