ओडिशा के मयूरभंज में मिले 1.5 करोड़ वर्ष पुराने समुद्री जीवों के जीवाश्म

ओडिशा के मयूरभंज में मिले 1.5 करोड़ वर्ष पुराने समुद्री जीवों के जीवाश्म

ओडिशा के मयूरभंज जिले में वैज्ञानिकों को एक महत्वपूर्ण जीवाश्म खोज में लगभग 1.5 करोड़ वर्ष पुराने समुद्री जीवों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। 18 जून 2026 को बारिपदा के निकट बुधबलंगा नदी के किनारे स्थित बारिपदा फॉसिल बेड से शार्क के दांत, शार्क की कशेरुकाएं, मछलियों की हड्डियां, मोलस्क के खोल तथा सूक्ष्म समुद्री जीवों के जीवाश्म मिले हैं। यह खोज न केवल क्षेत्र के प्राचीन भूवैज्ञानिक इतिहास को समझने में सहायक है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि वर्तमान में स्थलभाग वाला यह क्षेत्र कभी समुद्र के नीचे था।

मियोसीन युग और प्राचीन समुद्री वातावरण

प्राप्त जीवाश्म मियोसीन युग से संबंधित हैं, जो लगभग 2.3 करोड़ वर्ष पहले शुरू होकर 53 लाख वर्ष पहले तक चला था। यह काल पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास में निओजीन काल का एक महत्वपूर्ण भाग माना जाता है। मयूरभंज जैसे वर्तमान आंतरिक क्षेत्र में समुद्री जीवों के जीवाश्मों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि लाखों वर्ष पहले ओडिशा के कुछ हिस्से उथले समुद्र से ढके हुए थे। यह खोज प्राचीन समुद्री पर्यावरण और भूगर्भीय परिवर्तनों के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

बारिपदा फॉसिल बेड की विशेषताएं

बारिपदा फॉसिल बेड में कशेरुकी और अकशेरुकी दोनों प्रकार के जीवों के अवशेष संरक्षित हैं। यहां शार्क के दांत और कशेरुकाएं सबसे अधिक पाए जाने वाले समुद्री कशेरुकी जीवाश्मों में शामिल हैं। प्रारंभिक अध्ययनों के अनुसार, स्थल से प्राप्त मछली जीवाश्मों में लगभग आधे अवशेष शार्क से संबंधित हैं। इसके अलावा मोलस्क के खोल और सूक्ष्म जीवाश्म भी मिले हैं, जिनका उपयोग प्राचीन पर्यावरणीय परिस्थितियों को समझने में किया जाता है। वर्तमान बंगाल की खाड़ी का तट बारिपदा से लगभग 60 किलोमीटर दूर है, लेकिन यह जीवाश्म समूह इस क्षेत्र के बहुत पुराने समुद्री स्वरूप का प्रमाण प्रस्तुत करता है।

खोज और अनुसंधान

यह महत्वपूर्ण खोज एक छात्र शैक्षणिक भ्रमण के दौरान हुई। इस अभियान का नेतृत्व उत्तर ओडिशा विश्वविद्यालय और महाराजा श्रीराम चंद्र भंजदेव विश्वविद्यालय के रिमोट सेंसिंग एवं जीआईएस विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. देबब्रत नंदी ने किया। जीवाश्मों के विस्तृत अध्ययन के लिए जीवाश्म वैज्ञानिकों और अन्य अनुसंधान संस्थानों के साथ सहयोग किया जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आगे के शोध से क्षेत्र के समुद्री इतिहास और जैव विविधता के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त हो सकती है।

स्थानीय लोककथाओं से जुड़ा इतिहास

मयूरभंज के स्थानीय निवासी लंबे समय से इन असामान्य हड्डी जैसे अवशेषों को “असुर हड्डा” के नाम से जानते रहे हैं। स्थानीय भाषा में इसका अर्थ “दानव की हड्डियां” होता है। यह नाम क्षेत्र की लोकस्मृति और पारंपरिक मान्यताओं का हिस्सा है, जो दर्शाता है कि इन जीवाश्मों की जानकारी स्थानीय समाज में लंबे समय से मौजूद थी।

भू-धरोहर संरक्षण की संभावनाएं

बारिपदा जीवाश्म क्षेत्र को संभावित भू-धरोहर स्थल या फॉसिल पार्क के रूप में विकसित करने पर भी चर्चा हो रही है। भारत में ऐसे भू-धरोहर स्थलों का उपयोग वैज्ञानिक अनुसंधान, शैक्षिक गतिविधियों, संरक्षण तथा भू-पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है। यदि इस क्षेत्र को आधिकारिक भू-धरोहर का दर्जा मिलता है, तो यह न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा, बल्कि स्थानीय पर्यटन और जन-जागरूकता को भी बढ़ावा देगा।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • मियोसीन युग, निओजीन काल और सेनोजोइक महाकल्प का एक महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक चरण है।
  • शार्क के दांत सबसे टिकाऊ कशेरुकी जीवाश्मों में गिने जाते हैं क्योंकि उनका एनामेल लाखों वर्षों तक सुरक्षित रह सकता है।
  • फॉसिल बेड अवसादी चट्टानों की ऐसी परतें होती हैं जिनमें प्राचीन जीवों के अवशेष या उनके निशान संरक्षित रहते हैं।
  • भू-धरोहर स्थल वैज्ञानिक अध्ययन, शिक्षा, संरक्षण और भू-पर्यटन के लिए संरक्षित भूवैज्ञानिक क्षेत्रों को कहा जाता है।

मयूरभंज के बारिपदा क्षेत्र में मिले 1.5 करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्म ओडिशा के प्राचीन समुद्री इतिहास का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। यह खोज न केवल वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए नई संभावनाएं खोलती है, बल्कि क्षेत्र को भू-धरोहर और पर्यटन के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित करने का अवसर भी प्रदान करती है। आने वाले वर्षों में विस्तृत अध्ययन इस क्षेत्र के भूवैज्ञानिक और जैविक इतिहास पर और अधिक प्रकाश डाल सकते हैं।

Originally written on June 20, 2026 and last modified on June 20, 2026.

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