ऑनलाइन अवैध सामग्री हटाने की समय-सीमा 3 घंटे हुई

ऑनलाइन अवैध सामग्री हटाने की समय-सीमा 3 घंटे हुई

केंद्र सरकार ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अवैध सामग्री हटाने की प्रक्रिया को और सख्त करते हुए सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में बड़ा बदलाव किया है। नए प्रावधानों के तहत वैध अदालत आदेश या सरकारी नोटिस मिलने के बाद इंटरमीडियरीज़ को ऐसी सामग्री हटाने के लिए अब 36 घंटे नहीं, बल्कि सिर्फ 3 घंटे का समय मिलेगा। यह बदलाव 20 फरवरी 2026 से पूरे देश में लागू हो गया है।

क्या बदला और क्यों अहम है

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 10 फरवरी 2026 को सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2026 अधिसूचित किए। इन नियमों का उद्देश्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर अवैध, भ्रामक और संवेदनशील सामग्री पर तेज कार्रवाई सुनिश्चित करना है। सरकार का मानना है कि डिजिटल स्पेस में सामग्री तेजी से फैलती है, इसलिए हटाने की प्रक्रिया भी उतनी ही तेज होनी चाहिए।नए नियमों में संवेदनशील उपयोगकर्ता शिकायतों, जैसे नग्नता और पहचान की नकल, पर कार्रवाई की समय-सीमा 24 घंटे से घटाकर 2 घंटे कर दी गई है। सामान्य उपयोगकर्ता शिकायतों के निपटारे की समय-सीमा भी 72 घंटे से घटाकर 36 घंटे कर दी गई है।

इंटरमीडियरी पर क्या जिम्मेदारी

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की कानूनी जिम्मेदारियों की आधारशिला है। इस कानून की धारा 79 इंटरमीडियरीज़ को सुरक्षित-आश्रय यानी सेफ-हार्बर संरक्षण देती है, लेकिन यह संरक्षण तभी मिलता है जब वे उचित सावधानी बरतें और वैध निर्देशों का पालन करें। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, इंटरनेट सेवा प्रदाता और ऑनलाइन मार्केटप्लेस इसी श्रेणी में आते हैं।नए नियमों के अनुसार यह समय-सीमा केवल वैध अदालत आदेश या कानून के तहत जारी सरकारी नोटिस पर लागू होगी। यानी प्लेटफॉर्म्स को हर शिकायत पर नहीं, बल्कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत मिले निर्देशों पर तय समय में कार्रवाई करनी होगी।

एआई सामग्री और डीपफेक पर नया फोकस

2026 के संशोधन नियमों की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें पहली बार “सिंथेटिकली जेनरेटेड इन्फॉर्मेशन” की कानूनी परिभाषा दी गई है। इसका सीधा संबंध एआई-जनित सामग्री, खासकर डीपफेक जैसी तकनीकों से है। नियमों के तहत इंटरमीडियरीज़ को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी सामग्री पर स्पष्ट लेबल हो और उसका मेटाडेटा ट्रेस किया जा सके।यह प्रावधान इसलिए अहम है क्योंकि एआई टूल्स से बनी नकली तस्वीरें, वीडियो और ऑडियो तेजी से वायरल हो सकते हैं और गलत सूचना, पहचान की चोरी या सार्वजनिक भ्रम की स्थिति पैदा कर सकते हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 भारत में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, डिजिटल हस्ताक्षर और इंटरमीडियरी दायित्व से जुड़ा प्रमुख कानून है।
  • धारा 79 के तहत इंटरमीडियरीज़ को कुछ शर्तों के साथ सेफ-हार्बर संरक्षण मिलता है।
  • इंटरमीडियरी दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता नियम पहली बार 2021 में अधिसूचित किए गए थे।
  • डीपफेक एआई तकनीकों से तैयार की गई सिंथेटिक मीडिया सामग्री होती है, जिसमें चेहरा बदलना या नकली ऑडियो-वीडियो बनाना शामिल हो सकता है।

कुल मिलाकर, यह संशोधन भारत में ऑनलाइन जवाबदेही, तेज कंटेंट मॉडरेशन और एआई-जनित सामग्री पर नियंत्रण की दिशा में एक सख्त कदम माना जा रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए अब अनुपालन समय कम हो गया है और कानूनी निर्देशों पर त्वरित कार्रवाई अनिवार्य हो गई है।

Originally written on August 6, 2026 and last modified on August 6, 2026.

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