एमएसएमई भुगतान सुधार से नकदी प्रवाह और विवाद निपटान को नई गति

एमएसएमई भुगतान सुधार से नकदी प्रवाह और विवाद निपटान को नई गति

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई के लिए समय पर भुगतान सुनिश्चित करने और विवादों के निपटारे को तेज करने के उद्देश्य से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 राज्यसभा में 28 जुलाई 2026 को पेश किया गया। यह विधेयक 2006 के मौजूदा कानून में बदलाव का प्रस्ताव करता है और इसमें विलंबित भुगतान, मध्यस्थता, डिजिटल पंजीकरण तथा कुछ अपराधों के लिए दंड व्यवस्था में सुधार जैसे प्रावधान शामिल हैं।

एमएसएमई के लिए भुगतान प्रणाली में बदलाव

विधेयक का सबसे अहम पहलू केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों को एमएसएमई के बिलों का निपटान आरबीआई-अधिकृत ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम यानी TReDS प्लेटफॉर्म के जरिए करने की दिशा में ले जाना है। TReDS एक इलेक्ट्रॉनिक मंच है, जहां सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के व्यापारिक देयों का वित्तपोषण कई फाइनेंसरों के माध्यम से किया जाता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य भुगतान में देरी से होने वाली नकदी संकट की समस्या को कम करना है। एमएसएमई क्षेत्र में कार्यशील पूंजी का चक्र अक्सर देरी से प्रभावित होता है, इसलिए समय पर इनवॉइस भुगतान इस क्षेत्र की स्थिरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

विवाद निपटान के लिए तय समयसीमा

विधेयक एमएसएमई भुगतान विवादों के समाधान के लिए कानूनी समयसीमा तय करता है। इसके अनुसार मध्यस्थता 90 दिनों के भीतर पूरी की जानी चाहिए, जबकि पंचाट पुरस्कार pleadings पूरी होने के 90 दिनों के भीतर जारी किया जाना प्रस्तावित है। यदि किसी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका छह महीने से अधिक समय तक लंबित रहती है, तो अदालत एमएसएमई आपूर्तिकर्ता को पुरस्कार राशि का कम से कम 50% भुगतान करने का आदेश दे सकती है। यह प्रावधान छोटे उद्यमों को लंबी कानूनी प्रक्रिया में फंसने से बचाने और उनके नकदी प्रवाह को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके साथ ही राज्य सरकारों को और अधिक सूक्ष्म एवं लघु उद्यम सुविधा परिषदें स्थापित करने तथा उनकी संरचना तय करने का अधिकार देने का भी प्रस्ताव है, बशर्ते परिषद में एक विधि विशेषज्ञ की उपस्थिति हो।

डिजिटल पंजीकरण और दंड व्यवस्था में सुधार

विधेयक एक राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए एमएसएमई पंजीकरण को निःशुल्क और स्वैच्छिक बनाने का प्रस्ताव करता है। साथ ही राज्य सरकारों को पंजीकरण से जुड़ी सेवाओं के लिए अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने की भी अनुमति दी जा सकती है। प्रवर्तन के स्तर पर भी बदलाव प्रस्तावित हैं। मध्यस्थता से हुए समझौते और पंचाट पुरस्कारों की वसूली भू-राजस्व बकाया की तरह की जा सकेगी। इसके अलावा इन्हें दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के तहत भी मान्यता देने का प्रावधान है। विधेयक कुछ अपराधों के लिए आपराधिक दंड की जगह श्रेणीबद्ध मौद्रिक दंड लागू करने की बात करता है। इसका अर्थ है कि उल्लंघन की प्रकृति और बार-बार होने की स्थिति के आधार पर जुर्माना तय किया जाएगा।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 भारत में एमएसएमई से जुड़ा प्रमुख कानून है।
  • TReDS प्लेटफॉर्म आरबीआई द्वारा विनियमित होते हैं और इनका उपयोग इनवॉइस डिस्काउंटिंग तथा रिसीवेबल्स फाइनेंसिंग के लिए किया जाता है।
  • सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषदें एमएसएमई के विलंबित भुगतान विवादों का समाधान करती हैं।
  • दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 भारत में दिवाला समाधान की कानूनी रूपरेखा प्रदान करती है।

कुल मिलाकर यह विधेयक एमएसएमई क्षेत्र में भुगतान अनुशासन, तेज विवाद निपटान और डिजिटल अनुपालन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। छोटे उद्यमों के लिए समय पर भुगतान और आसान पंजीकरण, दोनों ही उनकी वित्तीय सेहत के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।

Originally written on July 29, 2026 and last modified on July 29, 2026.

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