आरबीआई ने सहकारी बैंकों के निदेशकों के लिए तीन वर्ष का कूलिंग-ऑफ नियम लागू किया

आरबीआई ने सहकारी बैंकों के निदेशकों के लिए तीन वर्ष का कूलिंग-ऑफ नियम लागू किया

Reserve Bank of India ने 25 मई 2026 को शहरी और ग्रामीण सहकारी बैंकों के लिए अंतिम संशोधन निर्देश जारी किए। इन नए नियमों के तहत किसी सहकारी बैंक के निदेशक मंडल में लगातार 10 वर्ष पूरा करने वाले निदेशक के लिए तीन वर्ष का अनिवार्य “कूलिंग-ऑफ पीरियड” लागू किया गया है। यह कदम सहकारी बैंकों में बेहतर प्रशासन, पारदर्शिता और नेतृत्व में बदलाव सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है। नए निर्देश 25 मई 2026 से प्रभावी हो गए हैं।

किन बैंकों पर लागू होंगे नियम?

यह नियम शहरी सहकारी बैंकों, राज्य सहकारी बैंकों और केंद्रीय सहकारी बैंकों के निदेशकों पर लागू होगा। यदि कोई निदेशक किसी एक ही सहकारी बैंक के बोर्ड में लगातार 10 वर्ष तक कार्य करता है, तो वह तीन वर्ष के अंतराल के बाद ही उसी बैंक में दोबारा नियुक्ति के लिए पात्र होगा। हालांकि, संबंधित व्यक्ति अन्य किसी सहकारी बैंक के बोर्ड में निदेशक के रूप में नियुक्त हो सकता है, यदि वह वहां लागू नियमों के अनुसार पात्र हो।

कूलिंग-ऑफ अवधि में क्या प्रतिबंध होंगे?

तीन वर्ष की कूलिंग-ऑफ अवधि के दौरान पूर्व निदेशक उसी बैंक से किसी भी अन्य भूमिका में नहीं जुड़ सकेगा। उसे केवल बैंक के सदस्य या ग्राहक के रूप में बने रहने की अनुमति होगी। इसका उद्देश्य बैंक प्रबंधन में लंबे समय तक एक ही समूह के प्रभाव को कम करना और प्रशासनिक निष्पक्षता को बढ़ावा देना है।

कार्यकाल की गणना कैसे होगी?

नियमों के अनुसार यदि किसी निदेशक के कार्यकाल में तीन वर्ष से कम का अंतर होता है, तो उसे निरंतर कार्यकाल का हिस्सा माना जाएगा। केवल तीन वर्ष या उससे अधिक का अंतर ही कार्यकाल की गणना को रीसेट करेगा। इसका अर्थ है कि छोटे अंतराल के माध्यम से लगातार सेवा सीमा से बचना संभव नहीं होगा।

कानूनी पृष्ठभूमि

“बैंकिंग विनियमन (संशोधन) अधिनियम, 2025” के तहत सहकारी बैंकों के निदेशकों के अधिकतम निरंतर कार्यकाल को आठ वर्ष से बढ़ाकर दस वर्ष कर दिया गया था। यह प्रावधान 1 अगस्त 2025 से लागू हुआ था। अब आरबीआई ने संशोधित नियमों के माध्यम से इस बढ़े हुए कार्यकाल के बाद अनिवार्य अंतराल की व्यवस्था को स्पष्ट कर दिया है।

सहकारी बैंकिंग व्यवस्था

Reserve Bank of India भारत में बैंकिंग कंपनियों का नियमन “बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949” के तहत करता है। शहरी सहकारी बैंक मुख्य रूप से शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में कार्य करते हैं, जबकि ग्रामीण सहकारी बैंक कई राज्यों में दो-स्तरीय संरचना के माध्यम से संचालित होते हैं। राज्य सहकारी बैंक और केंद्रीय सहकारी बैंक भारत की सहकारी बैंकिंग प्रणाली के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • Reserve Bank of India भारत का केंद्रीय बैंक है।
  • सहकारी बैंकों के निदेशकों के लिए तीन वर्ष का कूलिंग-ऑफ पीरियड लागू किया गया है।
  • लगातार 10 वर्ष पूरा करने के बाद निदेशक को उसी बैंक में पुनर्नियुक्ति से पहले तीन वर्ष का अंतराल लेना होगा।
  • तीन वर्ष से कम का अंतर कार्यकाल में शामिल माना जाएगा।
  • “बैंकिंग विनियमन (संशोधन) अधिनियम, 2025” ने अधिकतम कार्यकाल को आठ से बढ़ाकर दस वर्ष किया था।
  • शहरी सहकारी बैंक मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों में कार्य करते हैं।

आरबीआई के ये नए निर्देश सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में सुशासन और पारदर्शिता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। इससे नेतृत्व में संतुलन और संस्थागत जवाबदेही बढ़ने की संभावना है।

Originally written on May 26, 2026 and last modified on May 26, 2026.

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