आयुर्वेद को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए नीति आयोग का रणनीतिक रोडमैप
भारत सरकार के नीति आयोग ने 2 जुलाई 2026 को प्राइसवाटरहाउसकूपर्स (पीडब्ल्यूसी) के सहयोग से “स्ट्रैटेजिक रोडमैप फॉर मेकिंग आयुर्वेद ग्लोबल” शीर्षक रिपोर्ट जारी की। इस रोडमैप का उद्देश्य वर्ष 2047 तक आयुर्वेद को वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित स्वास्थ्य प्रणाली के रूप में स्थापित करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी व्यापक स्वीकार्यता सुनिश्चित करना है। रिपोर्ट में अनुसंधान, वैश्विक मान्यता, निर्यात, चिकित्सा पर्यटन तथा संस्थागत सहयोग के माध्यम से आयुर्वेद के समग्र विकास की रणनीति प्रस्तुत की गई है।
आयुर्वेद और वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था
आयुर्वेद भारत की प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में से एक है और यह आयुष प्रणाली का प्रमुख हिस्सा है। आयुष के अंतर्गत आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा तथा होम्योपैथी शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 30 देशों में आयुर्वेद को विभिन्न स्तरों पर औपचारिक मान्यता प्राप्त है, जहाँ लाइसेंसिंग और स्वास्थ्य नीतियों में इसका अलग-अलग स्तर पर समावेश किया गया है। रोडमैप का लक्ष्य इस अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता को और अधिक मजबूत बनाना है।
अनुसंधान, वैज्ञानिक प्रमाण और सुरक्षा
रिपोर्ट में आयुर्वेदिक औषधियों की वैज्ञानिक पुष्टि के लिए बहु-देशीय क्लिनिकल परीक्षणों की सिफारिश की गई है। साथ ही, हर वर्ष वैश्विक स्तर पर प्रमाण और सुरक्षा संबंधी रिपोर्ट प्रकाशित करने का प्रस्ताव रखा गया है। विभिन्न रोगों में आयुर्वेद की चिकित्सीय उपयोगिता पर लक्षित अनुसंधान को भी प्राथमिकता देने की बात कही गई है। इसके अतिरिक्त, पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएल) के आधुनिकीकरण तथा पेटेंट निगरानी तंत्र विकसित करने का सुझाव दिया गया है। इन पहलों का उद्देश्य भारतीय पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान की सुरक्षा करना, जैविक संसाधनों के दुरुपयोग को रोकना और नवाचार को बढ़ावा देना है।
निर्यात, चिकित्सा पर्यटन और वैश्विक विस्तार
आयुष उत्पादों का निर्यात वर्ष 2014 में लगभग 1.09 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2023 में 2.16 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। ये उत्पाद लगभग 150 देशों में निर्यात किए गए, हालांकि विदेशी नियामकीय आवश्यकताओं के कारण इनमें से अनेक उत्पादों को आहार अनुपूरक (डायटरी सप्लीमेंट) के रूप में वर्गीकृत किया गया। रोडमैप का उद्देश्य इन उत्पादों को केवल सप्लीमेंट के बजाय वैश्विक स्तर पर विनियमित औषधियों के रूप में स्थापित करना है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय आयुर्वेद उपचार केंद्र, भारत में आयुर्वेद मेडिकल वैल्यू ट्रैवल ज़ोन तथा आयुष वीज़ा पैकेज जैसी पहलें प्रस्तावित की गई हैं। इससे चिकित्सा पर्यटन को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ भारत की स्वास्थ्य सेवाओं की वैश्विक पहुँच भी मजबूत होगी।
संस्थागत ढांचा और वैश्विक पहुँच
रिपोर्ट में वर्ष 2047 तक चरणबद्ध क्रियान्वयन के लिए आयुष मंत्री की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय मिशन स्टीयरिंग ग्रुप गठित करने की सिफारिश की गई है। इसके अलावा, ग्लोबल आयुर्वेद फोरम की स्थापना, जिनेवा, न्यूयॉर्क, लंदन, सिंगापुर और टोक्यो जैसे प्रमुख शहरों में आयुर्वेद अनुभव केंद्र विकसित करने तथा अंतरराष्ट्रीय मेडिकल संस्थानों में आयुर्वेद आधारित वैकल्पिक पाठ्यक्रम शुरू करने का भी प्रस्ताव रखा गया है। इन पहलों का उद्देश्य आयुर्वेद को वैश्विक चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का अभिन्न हिस्सा बनाना है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- आयुर्वेद भारत की सबसे प्राचीन और प्रलेखित चिकित्सा प्रणालियों में से एक है तथा इसका उल्लेख चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।
- पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएल) का निर्माण भारतीय पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान का दस्तावेजीकरण करने और उसके गलत पेटेंट या दुरुपयोग को रोकने के लिए किया गया था।
- आयुष का पूर्ण रूप है—आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा और होम्योपैथी।
- मेडिकल वैल्यू ट्रैवल का अर्थ है उपचार, निदान या स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक देश से दूसरे देश की यात्रा करना।
नीति आयोग का यह रणनीतिक रोडमैप आयुर्वेद को वैज्ञानिक प्रमाणों, वैश्विक सहयोग और आधुनिक नियामकीय ढांचे के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। यदि प्रस्तावित योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो भारत न केवल पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित कर सकेगा, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं, अनुसंधान, निर्यात और चिकित्सा पर्यटन के क्षेत्र में भी नई संभावनाएँ विकसित होंगी।