अरुणाचल में दुर्लभ हिमालयी मधुमक्खी की पहली भारतीय मौजूदगी
पूर्वी हिमालय की जैव विविधता पर हुए एक सर्वेक्षण में अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले से Colletes bhutanicus नामक दुर्लभ एकाकी हिमालयी मधुमक्खी का भारत में पहली बार रिकॉर्ड मिला है। यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे इस प्रजाति का ज्ञात दायरा भूटान और चीन से आगे बढ़कर भारत तक पहुंच गया है।
क्या है Colletes bhutanicus
यह प्रजाति solitary bee यानी एकाकी मधुमक्खियों के समूह में आती है और इसे plasterer bee भी कहा जाता है। ऐसी मधुमक्खियां शहद मधुमक्खियों की तरह बड़े सामाजिक छत्तों में नहीं रहतीं, बल्कि मादा सामान्यतः अलग-अलग घोंसला बनाती है। Colletes bhutanicus का पहली बार वर्णन 2003 में भूटान से किया गया था, और बाद में चीन के ऊंचाई वाले क्षेत्रों, खासकर शिज़ांग क्षेत्र, से भी इसका रिकॉर्ड मिला।
तवांग में कैसे मिला यह रिकॉर्ड
जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिकों ने पूर्वी हिमालय में 2019 से 2022 के बीच किए गए क्षेत्रीय सर्वेक्षणों के दौरान इस मधुमक्खी को तवांग में दर्ज किया। यह प्रजाति 1,500 से 3,800 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाई गई। इससे स्पष्ट होता है कि यह उच्च हिमालयी परिस्थितियों के अनुरूप ढली हुई प्रजाति है और ठंडे, ऊंचाई वाले आवासों में जीवित रहने की क्षमता रखती है।
परागण में भूमिका और वैज्ञानिक महत्व
अध्ययन में यह भी सामने आया कि यह मधुमक्खी 10 वनस्पति परिवारों की 25 फूलदार प्रजातियों पर जाती है। इनमें सरसों, कुट्टू, धनिया, सेम, मिर्च और बैंगन जैसे पौधे शामिल हैं। इस वजह से इसे एक generalist pollinator माना जाता है, यानी यह केवल कुछ खास पौधों तक सीमित नहीं रहती। पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र में ऐसी प्रजातियां फसलों और जंगली पौधों, दोनों के परागण में अहम भूमिका निभाती हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- Colletes bhutanicus को पहली बार 2003 में भूटान से वैज्ञानिक रूप से वर्णित किया गया था।
- भारत में इसका पहला रिकॉर्ड अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले से मिला।
- यह एकाकी मधुमक्खी है, यानी यह शहद मधुमक्खियों की तरह कॉलोनी में नहीं रहती।
- इस प्रजाति पर आधारित अध्ययन 5 अगस्त 2026 को International Journal of Tropical Insect Science में प्रकाशित हुआ।
पूर्वी हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ऐसी प्रजातियों का मिलना जैव विविधता के लिहाज से अहम संकेत देता है। यह खोज बताती है कि ऊंचाई वाले हिमालयी आवास अभी भी कई दुर्लभ परागणकों को आश्रय दे रहे हैं।