अरुणाचल प्रदेश में 110 साल बाद दिखी दुर्लभ ड्रैगनफ्लाई
अरुणाचल प्रदेश के नामदाफा राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व में 110 वर्षों बाद एक दुर्लभ ड्रैगनफ्लाई प्रजाति “गाइनाकैंथा खासीआका” फिर से देखी गई है। इसे सामान्य रूप से “लॉन्ग-टेल्ड डस्कहॉकर” कहा जाता है। यह खोज अक्टूबर 2024 में चांगलांग जिले में आयोजित जैव विविधता सर्वेक्षण के दौरान हुई, जिसने वैज्ञानिक समुदाय और पर्यावरण विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया है।
प्रजाति की विशेषताएं
गाइनाकैंथा खासीआका ड्रैगनफ्लाई परिवार एशनिडी से संबंधित है। नर ड्रैगनफ्लाई की आंखें हल्के नीले-हरे रंग की होती हैं। इसका वक्ष चमकीले हरे रंग का होता है, जिस पर गहरे रंग की धारियां दिखाई देती हैं। इसके पंख पारदर्शी और हल्के एम्बर रंग के होते हैं, जबकि लंबा पेट काले सिरे वाला होता है। इसकी आकर्षक बनावट इसे अन्य ड्रैगनफ्लाई प्रजातियों से अलग बनाती है।
110 साल बाद मिला रिकॉर्ड
अरुणाचल प्रदेश में इस प्रजाति का अंतिम प्रमाणित रिकॉर्ड वर्ष 1914 के एबोर अभियान के दौरान दर्ज किया गया था। इसके बाद एक सदी से अधिक समय तक यह प्रजाति राज्य में नहीं देखी गई। हालिया खोज इस बात का संकेत है कि पूर्वोत्तर भारत के वन क्षेत्रों में अभी भी कई दुर्लभ जीव प्रजातियां मौजूद हैं, जिनकी वैज्ञानिक जानकारी सीमित है।
कैसे हुई खोज
इस दुर्लभ ड्रैगनफ्लाई को मियाओ-विजयनगर सड़क मार्ग के पास चार नागरिक वैज्ञानिकों—आर. महेश, राजेश गोपीनाथ, गौरव जोशी और रोशन उपाध्याय—ने देखा और उसका चित्र लिया। इस खोज का विवरण “जर्नल ऑफ थ्रेटेंड टैक्सा” के नवीनतम अंक में प्रकाशित किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित सर्वेक्षणों के कारण यह प्रजाति लंबे समय तक नजर नहीं आई।
आवास और वितरण
यह प्रजाति घने जंगलों और वन किनारों वाले क्षेत्रों में पाई जाती है। भारत के अलावा नेपाल, म्यांमार और बांग्लादेश में भी इसके रिकॉर्ड मिल चुके हैं। भारत में असम, मेघालय, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में भी इसकी उपस्थिति दर्ज की गई है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
” ड्रैगनफ्लाई ओडोनाटा गण से संबंधित कीट हैं। ” नामदाफा राष्ट्रीय उद्यान अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले में स्थित है। ” एबोर अभियान वर्ष 1914 में पूर्वी हिमालय क्षेत्र में चलाया गया था। ” ओडोनाटा गण में ड्रैगनफ्लाई और डैम्सेलफ्लाई दोनों शामिल होते हैं। अरुणाचल प्रदेश में इस दुर्लभ ड्रैगनफ्लाई की पुनः खोज जैव विविधता संरक्षण के महत्व को दर्शाती है। यह खोज पूर्वोत्तर भारत के वन क्षेत्रों में वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरणीय सर्वेक्षणों की आवश्यकता को भी उजागर करती है।