अंतरिक्ष की रेस में चीन का बड़ा दांव: कैसे रॉकेट बूस्टर रिकवरी बदल देगी स्पेस बिजनेस का खेल?
अंतरिक्ष की रेस में अब केवल रॉकेट को स्पेस में भेजना ही काफी नहीं रह गया है, बल्कि उसे सुरक्षित वापस धरती पर उतारना सबसे बड़ा गेम-चेंजर बन चुका है। एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने रीयूजेबल रॉकेट (दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेट) के जरिए अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में अपना एकछत्र राज कायम किया है। लेकिन अब इस मैदान में चीन ने एक ऐसी कामयाबी हासिल की है, जिसने पूरी दुनिया के स्पेस साइंटिस्ट्स और बिजनेस एक्सपर्ट्स का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। चीन ने हाल ही में अपने रॉकेट बूस्टर रिकवरी तकनीक में एक बड़ी सफलता हासिल की है। इस तकनीक के जरिए चीन न केवल अंतरिक्ष में अपनी ताकत बढ़ा रहा है, बल्कि स्पेस मिशन की भारी-भरकम लागत को भी जमीन पर लाने की तैयारी कर चुका है। आइए समझते हैं कि चीन की यह नई कामयाबी क्या है और यह कैसे ग्लोबल स्पेस बिजनेस के समीकरणों को बदलने वाली है।
क्या है चीन की रॉकेट बूस्टर रिकवरी तकनीक?
जब भी कोई विशालकाय रॉकेट अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरता है, तो उसे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकालने के लिए सबसे ज्यादा ताकत की जरूरत होती है। यह ताकत रॉकेट के निचले हिस्से में लगे भारी-भरकम ‘बूस्टर्स’ प्रदान करते हैं। काम पूरा होने के बाद, ये बूस्टर मुख्य रॉकेट से अलग हो जाते हैं। पारंपरिक तौर पर ये बूस्टर समुद्र में गिरकर नष्ट हो जाते थे या अंतरिक्ष का कचरा बन जाते थे। चीन ने जिस तकनीक का सफल परीक्षण किया है, उसके तहत इन बूस्टर्स को हवा में ही नियंत्रित करके एक निश्चित और सुरक्षित स्थान पर वापस उतारा जा सकता है। चीन की सरकारी और निजी स्पेस कंपनियां अब ऐसे गाइडेड सिस्टम और ग्रिड फिन्स (ग्रिड पंख) का इस्तेमाल कर रही हैं, जो गिरते हुए बूस्टर की दिशा और गति को नियंत्रित करते हैं। इससे बूस्टर को ठीक उसी जगह लैंड कराया जा सकता है, जहां वैज्ञानिक चाहते हैं।

स्पेसएक्स को टक्कर देने की तैयारी
अंतरिक्ष के बाजार में इस समय स्पेसएक्स का ‘फाल्कन 9’ रॉकेट सबसे लोकप्रिय है क्योंकि इसके बूस्टर वापस जमीन या समुद्री प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर लैंड करते हैं। चीन काफी समय से इस तकनीक को हासिल करने की कोशिश में था। चीन की इस नई सफलता के बाद अब वह दिन दूर नहीं जब चीनी रॉकेट भी मस्क के रॉकेट की तरह ही बार-बार उड़ान भर सकेंगे। चीन की सरकारी कंपनी सीएएससी (CASC) के साथ-साथ कई चीनी प्राइवेट स्टार्टअप्स जैसे ‘लैंडस्पेस’ और ‘डीप ब्लू एयरोस्पेस’ इस रीयूजेबल रॉकेट रेस में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। इन्होंने वर्टिकल टेकऑफ और वर्टिकल लैंडिंग (VTVL) के कई सफल टेस्ट पूरे किए हैं, जो यह साबित करते हैं कि चीन अब अमेरिकी कंपनियों पर अपनी निर्भरता पूरी तरह खत्म करना चाहता है।

पैसे और समय की अंधाधुंध बचत: असली बिजनेस मॉडल
अंतरिक्ष का बिजनेस पूरी तरह से लागत और मुनाफे के गणित पर चलता है। एक नए रॉकेट को बनाने में करोड़ों डॉलर का खर्च आता है और इसमें महीनों का समय लगता है। अगर रॉकेट का सबसे महंगा हिस्सा यानी उसका बूस्टर और इंजन सुरक्षित बच जाए, तो स्पेस मिशन की पूरी इकोनॉमी बदल जाती है। इस तकनीक के मुख्य आर्थिक फायदे इस प्रकार हैं:
- लागत में भारी कटौती: रॉकेट के कुल खर्च का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा उसके पहले चरण (First Stage) और बूस्टर्स पर खर्च होता है। इन्हें दोबारा इस्तेमाल करने से हर लॉन्च की लागत आधी से भी कम हो जाती है।
- लॉन्च फ्रीक्वेंसी में बढ़ोतरी: नए रॉकेट बनाने के इंतजार के बिना, पुरानी बूस्टर को रीफर्बिश (सफाई और जांच) करके कुछ ही दिनों के भीतर दोबारा लॉन्च किया जा सकता है।
- सैटेलाइट मार्केट पर कब्जा: कम लागत के कारण चीन दुनिया भर के देशों और निजी कंपनियों को बेहद सस्ते दामों पर सैटेलाइट लॉन्च करने की सुविधा दे सकेगा, जिससे ग्लोबल सैटेलाइट मार्केट में उसकी हिस्सेदारी तेजी से बढ़ेगी।
सुरक्षा के लिहाज से चीन के लिए क्यों जरूरी थी यह तकनीक?
चीन के पास अमेरिका की तरह विशाल समुद्री तटों की सुविधा हर लॉन्च पैड के पास नहीं है। चीन के कई प्रमुख लॉन्च पैड जैसे शिचांग (Xichang) और ताइयुआन (Taiyuan) देश के अंदरूनी हिस्सों में, यानी चारों तरफ इंसानी आबादी से घिरे इलाकों में स्थित हैं। अतीत में कई बार ऐसा हुआ है कि चीनी रॉकेट्स के बूस्टर्स लॉन्च के बाद रिहायशी इलाकों या खेतों में जा गिरे, जिससे जान-माल का नुकसान होने का खतरा हमेशा बना रहता था। इस बूस्टर रिकवरी तकनीक के जरिए चीन अब गिरते हुए मलबे की सटीक लोकेशन तय कर सकता है। इससे न केवल आबादी वाले क्षेत्रों को सुरक्षित रखा जा सकेगा, बल्कि चीन के अंदरूनी लॉन्च पैड्स की कार्यक्षमता भी कई गुना बढ़ जाएगी।
भविष्य की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था और चीन का बढ़ता दबदबा
चीन का लक्ष्य केवल स्पेसएक्स की बराबरी करना नहीं है, बल्कि वह 2030 तक चांद पर अपने अंतरिक्ष यात्री भेजने और वहां एक परमानेंट बेस बनाने की योजना पर काम कर रहा है। इसके अलावा, चीन अपना खुद का मेगा-सैटेलाइट नेटवर्क (Guowang) भी तैयार कर रहा है, जिसमें हजारों सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में स्थापित किया जाना है। इतने बड़े स्तर पर सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजने के लिए पारंपरिक रॉकेट्स का इस्तेमाल करना आर्थिक रूप से नामुमकिन है। यही वजह है कि रॉकेट बूस्टर रिकवरी में मिली यह सफलता चीन के भविष्य के सभी अंतरिक्ष मिशनों की रीढ़ बनने वाली है।
स्पेस मलबे और अंतरिक्ष से जुड़े कुछ अनोखे तथ्य
अंतरिक्ष की इस रेस के बीच रॉकेट रिकवरी से जुड़े कुछ ऐसे पहलू भी हैं जो आम तौर पर चर्चा में नहीं आते। जब कोई रॉकेट बूस्टर अंतरिक्ष से वापस लौटता है, तो वायुमंडल के घर्षण के कारण उसका तापमान हजारों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे में उसे सुरक्षित बचाना किसी चमत्कार से कम नहीं होता। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि दुनिया भर की स्पेस एजेंसियां अब तक लाखों टन का मलबे अंतरिक्ष में छोड़ चुकी हैं, जो बुलेट की रफ्तार से पृथ्वी का चक्कर काट रहा है। चीन की इस नई तकनीक से भविष्य में अंतरिक्ष में कचरा बढ़ने की रफ्तार पर भी कुछ हद तक लगाम लगेगी। इसके साथ ही, इस रीयूजेबल रेस के कारण आने वाले समय में दुनिया भर के देशों के बीच अंतरिक्ष में संसाधनों पर कब्जे की जंग और तेज होने की पूरी संभावना है।