DRDO की नई पहल से मिसाइल निर्माण में निजी उद्योग की बड़ी भूमिका

DRDO की नई पहल से मिसाइल निर्माण में निजी उद्योग की बड़ी भूमिका

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने मिसाइल और गाइडेड बम निर्माण में भारतीय निजी रक्षा कंपनियों के साथ दीर्घकालिक साझेदारी की दिशा में कदम बढ़ाया है। 18 अगस्त 2026 को हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत (RCI) के माध्यम से जारी एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) के तहत संगठन ने विकास-सह-उत्पादन भागीदार (DcPP) मॉडल पर प्रस्ताव मांगे हैं। इस पहल का उद्देश्य रणनीतिक हथियार प्रणालियों के विकास और बड़े पैमाने पर उत्पादन में निजी क्षेत्र की क्षमता को जोड़ना है।

DcPP मॉडल क्या है और इसमें किसकी क्या भूमिका होगी

विकास-सह-उत्पादन भागीदार मॉडल रक्षा उत्पादन का ऐसा ढांचा है, जिसमें डिजाइन और तकनीकी विकास की जिम्मेदारी शोध संस्था के पास रहती है, जबकि चुनी गई निजी कंपनी प्रोटोटाइप एकीकरण, परीक्षण सहायता, योग्यता प्रक्रिया और उत्पादन विस्तार का काम संभालती है। इस व्यवस्था में DRDO तकनीकी नियंत्रण बनाए रखेगा, लेकिन औद्योगिक स्तर पर निर्माण की गति और क्षमता निजी भागीदारों के जरिए बढ़ाई जाएगी।

यह मॉडल इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे अनुसंधान और उत्पादन के बीच की दूरी कम होगी। साथ ही, जटिल हथियार प्रणालियों के लिए घरेलू औद्योगिक आधार मजबूत करने में मदद मिलेगी।

किन हथियार प्रणालियों पर फोकस है

इस प्रस्ताव के दायरे में अग्नि-श्रृंखला की मिसाइलें, भविष्य के परमाणु हथियार संस्करण, पनडुब्बी से प्रक्षेपित प्रणालियाँ और विकासाधीन हाइपरसोनिक मिसाइलें शामिल हैं। ये भारत की रणनीतिक मिसाइल और गाइडेड वेपन श्रेणी का हिस्सा हैं, जिसमें भूमि आधारित, समुद्री आधारित और उच्च गति वाली उन्नत प्रणालियाँ आती हैं।

इन प्रणालियों का महत्व केवल तकनीकी नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है, क्योंकि ये देश की प्रतिरोधक क्षमता, दीर्घ दूरी की मारक क्षमता और बहु-क्षेत्रीय रक्षा तैयारी से जुड़ी हैं।

कौन आवेदन कर सकता है और चयन कैसे होगा

इस साझेदारी के लिए वही कंपनियाँ पात्र होंगी जिनके पास सक्रिय रक्षा निर्माण लाइसेंस और पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) के लाइसेंस हों। पात्रता शर्तों में 34 करोड़ रुपये से अधिक की नेटवर्थ और पिछले पांच वर्षों में कम से कम दो वर्षों का लाभ शामिल है। कुछ संदर्भों में 100 करोड़ रुपये के न्यूनतम वार्षिक टर्नओवर की शर्त का भी उल्लेख किया गया है, हालांकि यह सभी जगह सार्वजनिक रूप से समान रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है।

DRDO प्रत्येक हथियार परियोजना के लिए कम से कम दो निजी कंपनियों का चयन करने की योजना बना रहा है। चुनी गई कंपनियाँ मिलकर प्रोटोटाइप विकसित करेंगी और आगे 50 से 100 इकाइयों के बड़े उत्पादन ऑर्डर के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगी।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • DRDO भारत के रक्षा मंत्रालय के अधीन काम करता है और मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोनॉटिक्स तथा कॉम्बैट सिस्टम्स पर शोध करता है।
  • रिसर्च सेंटर इमारत (RCI) हैदराबाद में स्थित है और मिसाइल प्रणालियों के विकास से जुड़ा प्रमुख केंद्र है।
  • अग्नि-श्रृंखला भारत की बैलिस्टिक मिसाइलों की वह श्रेणी है, जो रणनीतिक प्रतिरोधक क्षमता से जुड़ी मानी जाती है।
  • PESO भारत में विस्फोटक, पेट्रोलियम और संबंधित सुरक्षा लाइसेंसों के नियमन से जुड़ा संगठन है।

इस पहल पर 2 सितंबर 2026 को तकनीकी चर्चा प्रस्तावित है, जबकि प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तिथि 24 सितंबर 2026 तय की गई है। यह कदम भारत के रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की भागीदारी को नई दिशा दे सकता है।

Originally written on August 20, 2026 and last modified on August 20, 2026.

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