व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध संरक्षण के लिए एशिया में तेज हुए प्रयास

व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध संरक्षण के लिए एशिया में तेज हुए प्रयास

व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध (White-rumped Vulture) दुनिया के सबसे अधिक संकटग्रस्त पक्षियों में से एक है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने इसे अत्यंत संकटग्रस्त (Critically Endangered) श्रेणी में रखा है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाए जाने वाले इस गिद्ध की आबादी पिछले कुछ दशकों में तेजी से घटी है। इसका प्रमुख कारण विषैले पशु-चिकित्सा दर्दनाशक दवाओं का उपयोग, जहरीले शव, आवास का विनाश तथा बिजली की उच्च वोल्टेज लाइनों से होने वाली मौतें हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत सहित कई एशियाई देशों ने संरक्षण प्रयासों को और मजबूत किया है।

व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध की विशेषताएं

व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध का वैज्ञानिक नाम गिप्स बंगालेन्सिस (Gyps bengalensis) है। यह मुख्य रूप से मृत पशुओं के शवों को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्राकृतिक सफाईकर्मी के रूप में यह सड़ते हुए शवों को जल्दी समाप्त कर संक्रमण और बीमारियों के फैलाव को रोकने में मदद करता है। दक्षिण एशिया की तीन प्रमुख गिद्ध प्रजातियों में यह भी शामिल है, जिनकी संख्या डाइक्लोफेनाक जैसी विषैली पशु-चिकित्सा दवाओं के कारण तेजी से घट गई थी।

एशिया में संरक्षण की नई पहल

गिद्ध संरक्षण के लिए विभिन्न देशों में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं। कंबोडिया के लोम्फाट वन्यजीव अभयारण्य में जून 2026 में लगभग एक दशक बाद व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध का फिर से दिखाई देना संरक्षण प्रयासों की सफलता का संकेत माना गया। यहां ‘वल्चर रेस्टोरेंट’ यानी सुरक्षित शव-भोजन स्थलों की व्यवस्था की गई है, जहां गिद्धों को विषमुक्त भोजन उपलब्ध कराया जाता है। नेपाल में अक्टूबर 2025 से “Vultures, Cows and People – Strengthening an Ancient Relationship” परियोजना शुरू की गई है। इस पहल का उद्देश्य शुक्लाफांटा राष्ट्रीय उद्यान के आसपास दूसरा आधिकारिक वल्चर सेफ ज़ोन विकसित करना है, ताकि गिद्धों को सुरक्षित भोजन और आवास मिल सके। भारत में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) और विभिन्न राज्य वन विभागों ने हरियाणा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और असम के संरक्षित टाइगर रिजर्वों में 700 से अधिक कैप्टिव-ब्रीड गिद्धों को चरणबद्ध तरीके से छोड़ने की योजना बनाई है। यह कार्यक्रम गिद्धों की घटती आबादी को पुनर्जीवित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

प्रमुख खतरे और संरक्षण की चुनौतियां

गिद्धों के लिए सबसे बड़ा खतरा विषैले पशुओं के शव हैं। एक जहरीला शव एक साथ कई गिद्धों की जान ले सकता है। इसके अलावा बिजली की खुली उच्च वोल्टेज लाइनों से टकराने या करंट लगने से भी बड़ी संख्या में गिद्धों की मृत्यु होती है। जून 2026 में मुदुमलाई टाइगर रिजर्व में छोड़े गए एक रेडियो-टैग लगे व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध की नीलगिरि क्षेत्र में बिजली की लाइन से करंट लगने के कारण मृत्यु हो गई। विशेषज्ञों ने गिद्ध आवासों में बिजली की लाइनों पर इन्सुलेशन और बंच केबलिंग जैसी तकनीकों के उपयोग की सिफारिश की है। शहरीकरण, वनों की कटाई और खुले शव निस्तारण स्थलों की कमी भी इनके प्राकृतिक आवास और भोजन की उपलब्धता को प्रभावित कर रही है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध का वैज्ञानिक नाम गिप्स बंगालेन्सिस (Gyps bengalensis) है।
  • यह प्रजाति आईयूसीएन रेड लिस्ट में अत्यंत संकटग्रस्त (Critically Endangered) श्रेणी में शामिल है।
  • भारत ने वर्ष 2023 में ऐसक्लोफेनाक और केटोप्रोफेन तथा वर्ष 2024 में निमेसुलाइड जैसी गिद्धों के लिए हानिकारक पशु-चिकित्सा दवाओं के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया।
  • वल्चर सेफ ज़ोन ऐसे संरक्षण क्षेत्र होते हैं जहां गिद्धों को विषमुक्त भोजन, सुरक्षित आवास और प्रभावी निगरानी उपलब्ध कराई जाती है।

व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी घटती संख्या पर्यावरणीय संतुलन के लिए गंभीर चिंता का विषय है। वैज्ञानिक संरक्षण, सुरक्षित आवास, विषैले रसायनों पर नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से इस दुर्लभ प्रजाति को विलुप्त होने से बचाया जा सकता है। गिद्ध संरक्षण में सफलता न केवल जैव विविधता को मजबूत करेगी, बल्कि मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा के लिए भी अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगी।

Originally written on July 1, 2026 and last modified on July 1, 2026.

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