लद्दाख में राज्य का दर्जा और संवैधानिक अधिकारों की मांग तेज
लद्दाख में 23 जून 2026 को व्यापक बंद का आयोजन किया गया, जिसके तहत लेह और कारगिल जिलों में अधिकांश बाजार और व्यावसायिक प्रतिष्ठान बंद रहे। यह बंद लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस के आह्वान पर किया गया था। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में लद्दाख को राज्य का दर्जा देना, भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत शामिल करना तथा भूमि, रोजगार और सांस्कृतिक पहचान की संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित करना शामिल है। हालांकि आवश्यक परिवहन सेवाएं जारी रहीं, लेकिन क्षेत्र में जनसमर्थन के साथ आंदोलन ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया।
लद्दाख की संवैधानिक स्थिति
वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन किया गया था। इसके बाद लद्दाख को एक अलग केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा मिला। केंद्रशासित प्रदेशों का प्रशासन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 239 के अंतर्गत संचालित होता है। भारत में कुछ केंद्रशासित प्रदेशों के पास अपनी विधानसभा होती है, जबकि कुछ का प्रशासन सीधे केंद्र सरकार के माध्यम से किया जाता है। लद्दाख वर्तमान में ऐसा केंद्रशासित प्रदेश है जहां प्रदेश स्तर पर कोई निर्वाचित विधानसभा नहीं है। इसी कारण स्थानीय संगठनों द्वारा अधिक लोकतांत्रिक और प्रतिनिधिक शासन व्यवस्था की मांग लगातार उठाई जा रही है।
छठी अनुसूची और अनुच्छेद 371 का महत्व
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में से एक लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत विशेष संरक्षण प्रदान करना है। छठी अनुसूची पूर्वोत्तर भारत के कुछ जनजातीय क्षेत्रों में लागू होती है और वहां स्वायत्त जिला परिषदों की स्थापना का प्रावधान करती है। इन परिषदों को भूमि, वन, स्थानीय परंपराओं और सामाजिक प्रथाओं से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त होते हैं। इसके अलावा अनुच्छेद 371 का भी उल्लेख किया जा रहा है, जिसमें भारत के कुछ राज्यों के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान दिए गए हैं। नागालैंड, सिक्किम और मिजोरम जैसे राज्यों को उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक हितों की रक्षा के लिए विशेष व्यवस्थाएं प्राप्त हैं। लद्दाख के कई संगठन भी इसी प्रकार की संवैधानिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।
स्थानीय प्रशासन और संसाधनों पर नियंत्रण का मुद्दा
लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस के नेताओं ने बताया कि 22 मई 2026 को नई दिल्ली में गृह मंत्रालय की एक उपसमिति के साथ बैठक हुई थी। उनके अनुसार बैठक में हुई कुछ सहमतियों को आधिकारिक कार्यवृत्त में पूरी तरह शामिल नहीं किया गया। संगठनों ने एक ऐसी लोकतांत्रिक संरचना की मांग की है जिसमें लद्दाख को विधायी, कार्यकारी और वित्तीय अधिकार प्राप्त हों। इसके अतिरिक्त नई आबकारी नीति, भूमि डिजिटलीकरण प्रक्रिया तथा बिजली विभाग से संबंधित प्रस्तावों पर भी आपत्तियां जताई गई हैं। स्थानीय समुदायों का मानना है कि इन मुद्दों का सीधा संबंध भूमि, संसाधनों, प्रशासन और रोजगार पर स्थानीय नियंत्रण से है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारतीय संविधान की छठी अनुसूची पूर्वोत्तर भारत के कुछ जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है।
- अनुच्छेद 371 भारत के कुछ राज्यों के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान प्रदान करता है।
- लद्दाख को वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था।
- लेह और कारगिल लद्दाख के दो प्रमुख जिले हैं।
- लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस द्वारा राज्य का दर्जा और संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर वर्ष 2021 से आंदोलन जारी है।
लद्दाख का आंदोलन केवल प्रशासनिक बदलाव की मांग नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान, जनजातीय अधिकारों और स्थानीय संसाधनों पर नियंत्रण से जुड़ा एक व्यापक मुद्दा बन चुका है। केंद्र सरकार और स्थानीय संगठनों के बीच जारी वार्ताओं का परिणाम भविष्य में लद्दाख की संवैधानिक और प्रशासनिक संरचना को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है।