राजस्थान में विकसित सेंसर से पेयजल में सीसे की सूक्ष्म मात्रा का होगा पता

राजस्थान में विकसित सेंसर से पेयजल में सीसे की सूक्ष्म मात्रा का होगा पता

राजस्थान के जयपुर स्थित सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान (CURAJ) के शोधकर्ताओं ने 22 जून 2026 को एक उन्नत सेंसर विकसित किया है, जो पेयजल में मौजूद विषैले सीसा (लेड) आयनों की अत्यंत सूक्ष्म मात्रा का पता लगाने में सक्षम है। इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पानी की जांच के लिए किसी अतिरिक्त रसायन, बफर या अभिकर्मक की आवश्यकता नहीं होती। कम लागत और आसान उपयोग के कारण यह सेंसर जल गुणवत्ता निगरानी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

पेयजल में सीसा प्रदूषण की चुनौती

सीसा एक विषैला भारी धातु तत्व है, जो पाइपलाइन, फिटिंग्स और अन्य प्लंबिंग सामग्रियों के माध्यम से पेयजल में प्रवेश कर सकता है। इसकी सबसे चिंताजनक बात यह है कि सीसा मिला हुआ पानी अक्सर रंग, गंध या स्वाद में कोई स्पष्ट बदलाव नहीं दिखाता, जिससे प्रदूषण का पता लगाना कठिन हो जाता है। मानव शरीर में सीसे का लगातार संचय गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। यह विशेष रूप से तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। बच्चों में इसका प्रभाव अधिक गंभीर माना जाता है क्योंकि सीसा मस्तिष्क के विकास और सीखने की क्षमता पर प्रतिकूल असर डाल सकता है।

सेंसर की डिजाइन और परीक्षण

इस परियोजना का नेतृत्व CURAJ के रसायन विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर पंकज गुप्ता ने किया। इस शोध में फिनलैंड की नैनो प्रौद्योगिकी कंपनी CANATU ने भी सहयोग प्रदान किया। सेंसर में विशेष प्रकार के इलेक्ट्रोड का उपयोग किया गया है, जिनका परीक्षण विभिन्न जल स्रोतों में किया गया। शोधकर्ताओं ने इस तकनीक का परीक्षण नल के पानी के साथ-साथ गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी के जल नमूनों पर भी किया। इसके अतिरिक्त सेंसर की कार्यक्षमता को 5 डिग्री सेल्सियस से 45 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान दायरे में परखा गया। परिणामों के अनुसार यह एक स्थिर और स्व-संचालित विद्युत परीक्षण प्रणाली है, जिसे बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन के लिए भी उपयुक्त माना जा रहा है।

जल गुणवत्ता निगरानी में संभावित उपयोग

यह नई तकनीक घरेलू जल वितरण प्रणालियों, नगर जल आपूर्ति केंद्रों और जल शोधन संयंत्रों में उपयोग के लिए विकसित की गई है। इन स्थानों पर पेयजल की गुणवत्ता की निरंतर निगरानी अत्यंत आवश्यक होती है ताकि उपभोक्ताओं तक सुरक्षित पानी पहुंचाया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सेंसर जल प्रदूषण की प्रारंभिक पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इससे समय रहते आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जा सकेंगे और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को कम किया जा सकेगा। CURAJ के कुलपति प्रोफेसर आनंद भालेराव भी विश्वविद्यालय की अनुसंधान और नवाचार गतिविधियों से जुड़े हुए हैं, जो ऐसी तकनीकों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • सीसा (Lead) एक विषैला भारी धातु है, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठनों द्वारा प्रमुख जल प्रदूषकों में गिना जाता है।
  • सीसा युक्त पानी अक्सर रंगहीन और साफ दिखाई देता है, इसलिए केवल देखने से इसकी पहचान संभव नहीं होती।
  • गंगा और ब्रह्मपुत्र भारत की प्रमुख नदी प्रणालियां हैं, जिनका उपयोग वैज्ञानिक अनुसंधान और जल परीक्षण परियोजनाओं में किया जाता है।
  • नैनो प्रौद्योगिकी कंपनियां पदार्थों और उपकरणों को नैनो स्तर पर विकसित करती हैं, जिससे अधिक संवेदनशील और उन्नत तकनीकी समाधान संभव होते हैं।

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान द्वारा विकसित यह सेंसर जल सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम है। कम लागत, सरल संचालन और उच्च संवेदनशीलता के कारण यह तकनीक भविष्य में जल गुणवत्ता निगरानी प्रणालियों को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इससे सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के राष्ट्रीय प्रयासों को भी नई गति मिलने की उम्मीद है।

Originally written on June 23, 2026 and last modified on June 23, 2026.

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