आदिलाबाद में मिली दुर्लभ चारमुखी शिला स्तंभ की ऐतिहासिक खोज

आदिलाबाद में मिली दुर्लभ चारमुखी शिला स्तंभ की ऐतिहासिक खोज

तेलंगाना के आदिलाबाद जिले के भीमसारी गांव में जून 2026 में एक अत्यंत दुर्लभ चार-तरफा पत्थर का स्तंभ खोजा गया है, जिसने इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया है। इस स्तंभ की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें एक ही स्मारक पर बौद्ध, वैष्णव और शैव परंपराओं से जुड़ी मूर्तिकला का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। मध्यकालीन दक्कन क्षेत्र में विभिन्न धार्मिक परंपराओं के सह-अस्तित्व का यह एक महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जा रहा है।

बुद्ध परिनिर्वाण की कलात्मक परंपरा

बौद्ध धर्म में परिनिर्वाण का अर्थ गौतम बुद्ध के अंतिम महाप्रयाण से है, जो उनके कुशीनगर में देहांत के बाद प्राप्त हुआ। भारतीय मूर्तिकला में बुद्ध परिनिर्वाण को सामान्यतः लेटी हुई मुद्रा में दर्शाया जाता है, जिसमें बुद्ध अपने दाहिने करवट पर होते हैं और उनका दाहिना हाथ सिर के नीचे रखा जाता है। आदिलाबाद में मिले स्तंभ पर अंकित बुद्ध की प्रतिमा भी इसी पारंपरिक शैली का अनुसरण करती है। यह स्वरूप पाली बौद्ध ग्रंथ ‘परिनिब्बान सुत्त’ में वर्णित विवरणों से मेल खाता है। भारत के विभिन्न बौद्ध स्थलों पर परिनिर्वाण की प्रतिमाएं शिल्पकला, मंदिरों की दीवारों और एकाश्म मूर्तियों के रूप में देखने को मिलती हैं।

स्तंभ की विशेष संरचना और मूर्तियां

यह चारमुखी स्तंभ अपनी अनूठी संरचना के कारण विशेष महत्व रखता है। इसके प्रत्येक भाग पर अलग-अलग धार्मिक अथवा वीरतापूर्ण आकृतियां उकेरी गई हैं। एक ओर बुद्ध की परिनिर्वाण मुद्रा दिखाई देती है, जबकि दूसरी ओर विष्णु की शयन मुद्रा अर्थात विष्णु सयन मूर्ति का चित्रण किया गया है। तीसरे भाग पर एक वीर योद्धा की आकृति उकेरी गई है, जो उस काल की सैन्य संस्कृति और वीरता का प्रतीक मानी जाती है। चौथे भाग पर उमा लिंगन मूर्ति अंकित है, जिसमें भगवान शिव को उमा या पार्वती के साथ दर्शाया गया है। एक ही स्तंभ पर इन विविध धार्मिक प्रतीकों का समावेश तेलंगाना की पुरातात्विक धरोहर में अत्यंत दुर्लभ माना जा रहा है।

ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व

विशेषज्ञों ने शैलीगत विश्लेषण के आधार पर इस स्तंभ को 10वीं शताब्दी ईस्वी का माना है। उस समय दक्कन क्षेत्र में बौद्ध, शैव और वैष्णव परंपराएं समानांतर रूप से विकसित हो रही थीं। मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला में इन परंपराओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस खोज का श्रेय इतिहास व्याख्याता और कोठा तेलंगाना चरित्र ब्रुंदम के सदस्य रोड्डावरु पृथ्वीराज को दिया गया है। बाद में प्रसिद्ध इतिहास एवं धरोहर शोधकर्ताओं श्रीरामोजू हरगोपाल और डॉ. ई. शिवनागी रेड्डी ने भी इस स्तंभ का अध्ययन किया। विशेषज्ञों के अनुसार यह तेलंगाना में ऐसा पहला ज्ञात स्तंभ है, जिस पर तीन प्रमुख धार्मिक परंपराओं की छवियां एक साथ अंकित हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) वह स्थान है जहां गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण से जुड़ी परंपरा स्थापित है।
  • परिनिब्बान सुत्त, थेरवाद बौद्ध धर्म के पाली कैनन का महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
  • विष्णु सयन मूर्ति में भगवान विष्णु को शयन अवस्था में दर्शाया जाता है, जो ब्रह्मांडीय विश्राम का प्रतीक है।
  • उमा लिंगन मूर्ति शैव परंपरा की एक प्रमुख प्रतिमा शैली है, जिसमें शिव और पार्वती का संयुक्त स्वरूप दिखाई देता है।

आदिलाबाद में मिला यह चारमुखी शिला स्तंभ केवल एक पुरातात्विक खोज नहीं, बल्कि मध्यकालीन भारत की धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक समन्वय का जीवंत प्रमाण है। यह खोज न केवल तेलंगाना की ऐतिहासिक धरोहर को समृद्ध करती है, बल्कि दक्कन क्षेत्र में विभिन्न धार्मिक परंपराओं के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और कलात्मक अभिव्यक्ति की नई समझ भी प्रदान करती है।

Originally written on June 23, 2026 and last modified on June 23, 2026.

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