राजस्थान की प्रसिद्ध मांड लोकगायिका गवरी देवी का निधन
राजस्थान की सुप्रसिद्ध मांड लोकगायिका गवरी देवी का 11 जून 2026 को 98 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने पाली स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली। गवरी देवी राजस्थान की पारंपरिक मांड गायन शैली की सबसे प्रतिष्ठित कलाकारों में से एक थीं और उन्होंने लगभग आठ दशकों तक इस लोकसंगीत परंपरा को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके निधन से राजस्थान की लोकसांस्कृतिक विरासत को अपूरणीय क्षति पहुंची है। गवरी देवी का नाम मांड संगीत की पहचान बन चुका था। उनकी मधुर आवाज और लोकधुनों की प्रस्तुति ने न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश में उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाई। लोकसंगीत के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में उनके योगदान को लंबे समय तक याद किया जाएगा।
क्या है मांड संगीत परंपरा?
मांड राजस्थान की सबसे प्राचीन और लोकप्रिय लोकसंगीत परंपराओं में से एक है। यह संगीत शैली अपनी मधुर धुनों, भावपूर्ण गायन और लोककथाओं पर आधारित विषयों के लिए जानी जाती है। मांड गायन में राजस्थान की संस्कृति, लोकजीवन, प्रेम, वीरता और सामाजिक परंपराओं का सुंदर चित्रण मिलता है। यह परंपरा विशेष रूप से पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी और अर्ध-रेगिस्तानी क्षेत्रों में पीढ़ियों से प्रचलित रही है। मांड को राजस्थान के सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक भी माना जाता है।
गवरी देवी का जीवन और संगीत यात्रा
गवरी देवी का जन्म राजस्थान के बाड़मेर जिले के कोरण गांव में हुआ था। उनका परिवार लोकसंगीत से जुड़ा हुआ था और उनके माता-पिता पेशेवर लोक कलाकार थे। बचपन से ही उन्हें लोकसंगीत का वातावरण मिला, जिसने उन्हें इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपने जीवन के लगभग आठ दशक मांड गायन को समर्पित किए। उनकी प्रस्तुतियां राजस्थान की लोकसंस्कृति की आत्मा को दर्शाती थीं। ‘मोरे बोले रे’ उनका एक अत्यंत लोकप्रिय गीत था, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा।
मांड संगीत के संरक्षण में योगदान
गवरी देवी ने ऐसे समय में मांड गायन को जीवित रखा जब आधुनिक संगीत के बढ़ते प्रभाव के कारण कई पारंपरिक लोककलाएं धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही थीं। उन्होंने मंचों, सांस्कृतिक आयोजनों और लोक उत्सवों के माध्यम से इस परंपरा को नई पीढ़ियों तक पहुंचाया। उनकी कला ने राजस्थान के लोकसंगीत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें मांड संगीत की जीवित विरासत के रूप में भी देखा जाता था।
शोक की लहर और श्रद्धांजलि
गवरी देवी के निधन पर राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गहरा शोक व्यक्त किया। दोनों नेताओं ने उनके निधन को राजस्थान की सांस्कृतिक दुनिया के लिए बड़ी क्षति बताया। उनकी संगीत विरासत को उनके परिवार के सदस्य भी आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी पुत्रवधू सुंदरदेवी और पोती नीतू भी इसी लोकसंगीत परंपरा से जुड़ी हुई हैं।
राजस्थान की लोकसंगीत परंपरा
राजस्थान का लोकसंगीत अपनी विविधता और समृद्धि के लिए प्रसिद्ध है। मांड के अलावा पनिहारी, वीर रस के लोकगीत, भजन और अन्य क्षेत्रीय संगीत शैलियां राज्य की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लोकगायकों ने सदियों से लोककथाओं, ऐतिहासिक घटनाओं और सामाजिक परंपराओं को गीतों के माध्यम से संरक्षित रखा है। गवरी देवी इसी गौरवशाली परंपरा की एक प्रमुख प्रतिनिधि थीं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- मांड राजस्थान की पारंपरिक और प्राचीन लोकसंगीत शैलियों में से एक है।
- गवरी देवी का जन्म राजस्थान के बाड़मेर जिले के कोरण गांव में हुआ था।
- पाली राजस्थान का एक प्रमुख शहर है, जहां गवरी देवी अपने अंतिम समय तक रहीं।
- राजस्थान का लोकसंगीत लोककथाओं, इतिहास और सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
- गवरी देवी के अंतिम संस्कार का आयोजन 12 जून 2026 को पाली के सर्वोदय नगर स्थित मोक्ष धाम में किया गया।
गवरी देवी का निधन राजस्थान की लोकसांस्कृतिक धरोहर के लिए एक बड़ी क्षति है। उन्होंने अपने पूरे जीवन में मांड संगीत को संरक्षित और लोकप्रिय बनाने का कार्य किया। उनकी गायकी और योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे तथा राजस्थान की लोकसंगीत परंपरा में उनका नाम सदैव सम्मान के साथ याद किया जाएगा।