यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल होने की ओर बढ़ा कश्मीर का सूफियाना संगीत

यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल होने की ओर बढ़ा कश्मीर का सूफियाना संगीत

जम्मू-कश्मीर ने जून 2026 में अपनी प्राचीन शास्त्रीय संगीत परंपरा सूफियाना संगीत (सूफियाना मौसीकी/सूफियाना कलाम) को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage of Humanity) सूची में शामिल कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। इस संबंध में प्रस्ताव भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत न्यास (इंटैक) की कश्मीर इकाई द्वारा तैयार किया गया है। यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो इस अनूठी संगीत परंपरा को वैश्विक पहचान मिलने के साथ-साथ इसके संरक्षण और संवर्धन को भी नई गति मिलेगी।

सूफियाना संगीत की ऐतिहासिक विरासत

सूफियाना संगीत कश्मीर की एक प्राचीन शास्त्रीय संगीत शैली है, जिसकी शुरुआत 15वीं शताब्दी के आसपास मानी जाती है। यह संगीत सूफी दर्शन से प्रेरित है और इसमें भक्ति, आध्यात्मिकता, शास्त्रीय रागों तथा दार्शनिक विचारों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। समय के साथ इस संगीत परंपरा ने कश्मीर की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर विभिन्न सभ्यताओं और सांस्कृतिक प्रभावों को आत्मसात किया। इसकी प्रस्तुति पारंपरिक शास्त्रीय शैली में की जाती है और इसमें आध्यात्मिक कविता का विशेष महत्व होता है।

यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची का महत्व

यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची का उद्देश्य उन जीवित सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण करना है जो किसी समाज की पहचान और सांस्कृतिक निरंतरता का आधार होती हैं। इसमें लोक एवं शास्त्रीय कलाएं, प्रदर्शन कलाएं, सामाजिक परंपराएं, अनुष्ठान, पारंपरिक ज्ञान और हस्तशिल्प जैसी विधाएं शामिल होती हैं। किसी भी परंपरा को इस सूची में शामिल करने के लिए उसके इतिहास, समुदाय में प्रचलन, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण, संरक्षण उपायों तथा सांस्कृतिक महत्व का विस्तृत दस्तावेज तैयार किया जाता है।

वाद्ययंत्र और संगीत की विशेषताएं

सूफियाना संगीत में कई पारंपरिक वाद्ययंत्रों का उपयोग किया जाता है। इनमें संतूर, नेय, हारमोनियम, रबाब, तबला, सितार, साज़-ए-कश्मीर तथा सेहतार प्रमुख हैं। इस संगीत शैली की विशेष पहचान इसके मक़ाम (Maqam) हैं, जो विशिष्ट सुर-पद्धतियां या मधुर रचनात्मक ढांचे होते हैं। इन मक़ामों के माध्यम से आध्यात्मिक भाव, सूफी काव्य और शास्त्रीय संगीत का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया जाता है।

संरक्षण की चुनौती और भविष्य

वर्तमान समय में सूफियाना संगीत विलुप्ति के खतरे का सामना कर रहा है। इस विधा के बहुत कम अनुभवी उस्ताद शेष बचे हैं और कई पारंपरिक मक़ाम समय के साथ लुप्त हो चुके हैं। यह परंपरा मुख्यतः गुरु-शिष्य परंपरा और मौखिक शिक्षा पर आधारित रही है, जिसके कारण नई पीढ़ी में प्रशिक्षित कलाकारों की संख्या सीमित है। ऐसे में यूनेस्को की मान्यता मिलने से इस कला के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और नई पीढ़ी तक इसके प्रभावी हस्तांतरण को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • यूनेस्को का पूर्ण नाम संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (United Nations Educational, Scientific and Cultural Organisation) है।
  • अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में भवन या स्मारक नहीं, बल्कि जीवित सांस्कृतिक परंपराओं को शामिल किया जाता है।
  • इंटैक (INTACH) का पूरा नाम इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज है।
  • सूफियाना संगीत कश्मीर की विशिष्ट शास्त्रीय एवं सूफी संगीत परंपरा है, जिसकी पहचान इसके मक़ाम, आध्यात्मिक काव्य और पारंपरिक वाद्ययंत्रों से होती है।

सूफियाना संगीत केवल एक शास्त्रीय संगीत शैली नहीं, बल्कि कश्मीर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में इसे शामिल कराने का प्रयास इस अनमोल परंपरा को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने के साथ-साथ इसके संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रूप से पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

Originally written on June 25, 2026 and last modified on June 25, 2026.

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