मिजोरम विश्वविद्यालय का प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय बना देश का 21वां जैव विविधता भंडार

मिजोरम विश्वविद्यालय का प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय बना देश का 21वां जैव विविधता भंडार

भारत में जैव विविधता के संरक्षण और वैज्ञानिक अनुसंधान को नई मजबूती देते हुए मिजोरम विश्वविद्यालय, आइजोल स्थित प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय को जैव विविधता अधिनियम के तहत आधिकारिक डिज़ाइनेटेड रिपॉजिटरी (नामित भंडार) का दर्जा प्रदान किया गया है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 7 जुलाई 2026 को इस संबंध में अधिसूचना जारी की। यह निर्णय राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की अनुशंसा के आधार पर लिया गया। इस मान्यता के साथ यह संग्रहालय भारत का 21वां नामित जैविक भंडार बन गया है, जो जैविक नमूनों के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और वैज्ञानिक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

डिज़ाइनेटेड रिपॉजिटरी क्या होती है?

जैव विविधता अधिनियम, 2002 के अंतर्गत डिज़ाइनेटेड रिपॉजिटरी वह अधिकृत संस्थान होता है, जहां जैविक संसाधनों को सुरक्षित रूप से संरक्षित किया जाता है। यह अनुसंधान और व्यावसायिक गतिविधियों में उपयोग किए जाने वाले जैविक संसाधनों का कानूनी अभिलेख भी तैयार करता है। ऐसे भंडारों में वाउचर स्पेसिमेन सुरक्षित रखे जाते हैं, जो किसी प्रजाति की पहचान और वैज्ञानिक सत्यापन के लिए संदर्भ नमूनों के रूप में उपयोग किए जाते हैं। इससे जैव विविधता से जुड़े शोध कार्य अधिक प्रमाणिक और व्यवस्थित बनते हैं।

प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय की प्रमुख जिम्मेदारियां

मिजोरम विश्वविद्यालय का प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय मिजोरम तथा पूरे उत्तर-पूर्वी भारत की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के वाउचर स्पेसिमेन का संरक्षण करेगा। संग्रहालय में संरक्षित वनस्पतियों में टेरिडोफाइट्स और मैक्रोफंगी जैसी प्रजातियां शामिल होंगी, जबकि जीव-जंतुओं में सरीसृप, उभयचर, मछलियां, पतंगे, भृंग और तितलियों के नमूने सुरक्षित रखे जाएंगे। इसके अतिरिक्त, यह संग्रहालय क्षेत्र में खोजी जाने वाली नई प्रजातियों के टाइप स्पेसिमेन के आधिकारिक भंडार के रूप में भी कार्य करेगा, जो नई प्रजातियों के वैज्ञानिक नामकरण और पहचान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं।

मिजोरम की समृद्ध जैव विविधता

प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय की स्थापना वर्ष 2022 में मिजोरम विश्वविद्यालय परिसर में की गई थी। यह क्षेत्र विश्व के प्रमुख जैव विविधता क्षेत्रों में शामिल इंडो-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है। मिजोरम और उत्तर-पूर्वी भारत में 7,500 से अधिक पुष्पीय पौधों की प्रजातियां तथा 2,000 से अधिक जीव-जंतुओं की प्रजातियां पाई जाती हैं। यह क्षेत्र दुर्लभ और स्थानिक प्रजातियों के कारण वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए विशेष महत्व रखता है।

जैव विविधता संरक्षण में बढ़ेगी वैज्ञानिक क्षमता

इस मान्यता से उत्तर-पूर्व भारत में जैव विविधता संरक्षण, नई प्रजातियों के वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और अनुसंधान गतिविधियों को महत्वपूर्ण बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, जैविक संसाधनों के संरक्षण और उनके कानूनी अभिलेखीकरण की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होगी। इससे क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक संस्थानों के बीच सहयोग भी मजबूत होने की संभावना है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • जैव विविधता अधिनियम, 2002 भारत में जैव विविधता संरक्षण और जैविक संसाधनों के प्रबंधन के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है।
  • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक संस्था है।
  • टाइप स्पेसिमेन वह मूल संदर्भ नमूना होता है, जिसके आधार पर किसी नई प्रजाति का वैज्ञानिक नामकरण किया जाता है।
  • लेप्टोब्राकेला टैमडिल (Leptobrachella tamdil) मिजोरम में हाल ही में खोजी गई एक उभयचर प्रजाति है।

मिजोरम विश्वविद्यालय के प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय को देश का 21वां डिज़ाइनेटेड रिपॉजिटरी घोषित किया जाना भारत के जैव विविधता संरक्षण प्रयासों में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह निर्णय न केवल उत्तर-पूर्व भारत की समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण को नई दिशा देगा, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान, नई प्रजातियों के दस्तावेजीकरण और प्राकृतिक विरासत के सुरक्षित संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

Originally written on July 8, 2026 and last modified on July 8, 2026.

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