महिला जननांग विकृति पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
महिला जननांग विकृति यानी एफजीएम से जुड़ा मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय में नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष विचाराधीन है। यह जनहित याचिका दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित इस प्रथा के खिलाफ दायर की गई थी। इससे पहले जुलाई 2018 में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने प्रारंभिक रूप से माना था कि यह प्रथा निजता के अधिकार का उल्लंघन हो सकती है और पॉक्सो कानून के तहत अपराध की श्रेणी में भी आ सकती है।
क्या है महिला जननांग विकृति
एफजीएम का अर्थ महिलाओं या बालिकाओं के बाहरी जननांगों को गैर-चिकित्सीय कारणों से आंशिक या पूर्ण रूप से क्षति पहुंचाना या हटाना है। अंतरराष्ट्रीय कानून और सार्वजनिक स्वास्थ्य दस्तावेजों में इसे “फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन” कहा जाता है, जबकि कुछ संदर्भों में इसे महिला खतना भी कहा जाता है। भारत में इस प्रथा को शारीरिक क्षति, बाल संरक्षण, स्वास्थ्य, गरिमा और धार्मिक स्वतंत्रता के संदर्भ में देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि यह प्रथा नाबालिग लड़कियों को स्थायी शारीरिक और मानसिक आघात पहुंचा सकती है।
संवैधानिक बहस और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
यह मामला संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 से जुड़ा हुआ है, जो धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार प्रदान करते हैं। हालांकि अनुच्छेद 25 के तहत यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। 7 मई 2026 की सुनवाई में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि स्वास्थ्य के आधार पर एफजीएम पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है, बिना यह तय किए कि यह कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा है या नहीं। अदालत ने सुनवाई के दौरान पुरुष खतना और एफजीएम के बीच अंतर भी स्पष्ट किया तथा लड़कियों के शारीरिक, प्रजनन और मानसिक स्वास्थ्य पर इसके प्रभावों पर चर्चा की।
कानूनी प्रावधान और पॉक्सो कानून
भारत में अभी तक एफजीएम पर सीधा प्रतिबंध लगाने वाला कोई अलग कानून मौजूद नहीं है। हालांकि इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 319 से 326 के अंतर्गत चोट पहुंचाने से संबंधित प्रावधानों के तहत देखा जा सकता है। इसके अलावा पॉक्सो अधिनियम, 2012 के तहत भी यह मामला महत्वपूर्ण बन जाता है, क्योंकि यह कानून 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रथा को बच्चों के यौन शोषण और सुरक्षा के संदर्भ में भी परखा है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि भारत में एफजीएम से जुड़े मामलों का आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है, क्योंकि इसके लिए अलग कानूनी श्रेणी निर्धारित नहीं की गई है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
” एफजीएम का पूरा नाम “फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन” है। ” पॉक्सो अधिनियम, 2012 बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करता है। ” अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन यह स्वास्थ्य और नैतिकता के अधीन है। ” अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार प्रदान करता है। महिला जननांग विकृति पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई केवल धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं बल्कि महिलाओं और बालिकाओं के स्वास्थ्य, गरिमा और मानवाधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा बन चुकी है। अदालत का अंतिम निर्णय भविष्य में इस विषय पर भारत की कानूनी और सामाजिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।